Sunday, September 25, 2016

Gita Press Gorakhpur ki EbBooks




Hindi (हिन्दी)

Code 6
Gita Sadhak Sanjivani


Code 18
Shrimad Bhagwat Gita

Code 118
Durga Saptasati
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Dhyan Aur Mansik Puja
 
Code 225
Gajendra Moksh
 
Code 226
Sri Vishnusahasranaam
 
Code 229
Sri Narayan Kavach
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Code 563
Shivmahimanh Stotra
Code 729
Saar Sangrah
Code 1176
Sikha (Choti) Dharan ki Avsayakta
 
Code 1283
Satsang ki Marmik Batein
Code 1349
Sunder Kand
Code 1748
Santangopalsatotra
Code 1919
Sunderkand with Hanuman Chalisa
 
Code 1922
Gorakha avam Gosamverdhan

English (अंग्रेजी)
Code 1528
Hanuman Chalisa
Code 455
Srimad Bhagvadgita
Code 1318
Ramcharitamanas

Gujarati (ગુજરાતી)
Code 948
Sunderkand
Code 1052
Esi Janam mein bhagwat prapti
Code 1198
Hanuman Chalisa
Code 1941
Shiv Sahastranaam Strotam

Telugu (తెలుగు)
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Sri Shivstotravawali
Code 1029
Sankirtanawali
Code 1502
Hanumanchalisa
Code 1806
Sri Vendeteshwar Stotrawali

Odia (ଓଡ଼ିଆ)
Code 856
Hanuman Chalisa
Code 1750
Srimad Bhagwat..
 

Bangla (বাংলা)
Code 1659
Sri Sri Krishner..
Code 1797
Stavmala
Code 1881
Hanuman Chalisa

Marathi (मराठी)
Code 855
Haripath
Code 859
Sri Gyaneshwari
Code 1640
Sarth Manache Shlok
Code 1815
Gharagharateel Sanskarkatha

Tamil (தமிழ்)
Code 1788
Sri Murugan Tadimaale
Code 1789
Tiruppavai Vilkakam
 

Kannada (ಕನ್ನಡ)
Code 736
Nityastuti and Adityahardya Stotram
Code 738
Hanumat Stotrawali
Code 842
Sri Lalitashastramaam

Asamiya (অসমীয়া)
Code 1564
Mahapurush Srimant Shankardev
  

Malayalam (മലയാളം)
Code 1916
Srimad Bhagwatgita

Saturday, August 27, 2016

बचपन

बारबार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी
गया, ले गया तू जीवन की सब से मस्त खुशी मेरी।।

चिन्ता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छन्द।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनन्द?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोपड़ी और चीथड़ों में रानी।

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया।।

रोना और मचल जाना भी क्या आनन्द दिखाते थे
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे।।

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम, गीले गालों को सुखा दिया।।

दादा ने चन्दा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे।।

यह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई।।

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमंग रंगीली थी
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी।।

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी।।

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तू ने।
अरे! जवानी के फन्दे में मुझको फँसा दिया तू ने।।

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी है।
प्यारी, प्रीतम की रंग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं।।

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है।।

किन्तु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिन्ता के चक्कर में पड़ कर जीवन भी है भार बना।।

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शान्ति।
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली वह अपनी प्राकृत विश्रान्ति।।

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का सन्ताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नन्दन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।।

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थीं।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने लाई थी।।

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आहृलाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा।।

मैंने पूछा 'यह क्या लाई'? बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा- 'तुम्हीं खाओ'।।

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया।।

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ।।

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।।

Sunday, January 17, 2016

उधो मनकी मनमें रही

उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥
गोकुलते जब मथुरा पधारे कुंजन आग देही ॥१॥
पतित अक्रूर कहासे आये दुखमें दाग देही ॥२॥
तन तालाभरना रही उधो जल बल भस्म भई ॥३॥
हमरी आख्या भर भर आवे उलटी गंगा बही ॥४॥
सूरदास प्रभु तुमारे मिलन जो कछु भई सो भई ॥५॥