Saturday, November 4, 2017

पूजा-गीत



वंदना के इन स्वरों में,
एक स्वर मेरा मिला लो।

वंदिनी मा को न भूलो,
राग में जब मत्त झूलो,

अर्चना के रत्नकण में,
एक कण मेरा मिला लो।

जब हृदय का तार बोले,
शृंखला के बंद खोले,

हों जहाँ बलि शीश अगणित,
एक शिर मेरा मिला लो।



सोहनलाल द्विवेदी

Tuesday, August 22, 2017

हरिशंकर परसाई


मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी नामक गाँव में 22 अगस्त 1924 को जन्मे हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। जीवन के अनेक अभावों से संघर्ष करते हुए नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और फिर डिप्लोमा इन टीचिंग की उपाधि लेकर हरिशंकर परसाई ने सर्वप्रथम ताकू (इटारसी) के जंगल विभाग में नौकरी करने के बाद 6 महीने खंडवा में अध्यापन कार्य किया।


लगभग सोलह-सत्रह वर्षों तक अनेक विद्यालयों में अध्यापन करने के पश्चात नौकरी से सदा के लिए अवकाश लेकर जीवन पर्यंत स्वतंत्र लेखन किया। परसाई जी ने साहित्य और लेखन को मात्र आजीविका का साधन कभी नहीं माना। इसे वे एक जन-प्रतिबद्ध कार्य मानते रहे। इसीलिए सन् 1956 में 'वसुधा नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन किया तथा आर्थिक नुकसान के बावजूद सन् 1958 तक वे इसे लगातार निकालते रहे। आज भी हिंदी साहित्य जगत में 'वसुधा' को उसमें छपने वाली साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है। परसाई जी के महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अवदान के लिए जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की। सन् 1982 में ‘विकलांग श्रद्धा’ नामक व्यंग्य-संग्रह पर परसाई जी को साहित्य अकादमी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। परसाई जी को इसके अतिरिक्त अन्य अनेक पुरस्कारों से भी नवाजा गया।


अज्ञेय ने एक बार कहा था कि व्यक्ति का अनुभव संसार ही उसका भाषा संसार भी होता है। परसाई जी का अनुभव संसार अत्यंत विस्तृत और वैविध्यपूर्ण है, इसका प्रतिबिंबन होता है, उनके द्वारा रचित साहित्य में। जीवन, समाज, देश और दुनिया का शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जो इस साहित्य में न आया हो। उन्होंने भारतीय समाज के अंतर्विरोधों से लेकर अनेक गम्भीर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर समान अधिकार से लिखा। उनकी लेखनी ने हमेशा शोषित के पक्ष में आवाज़ उठायी और उनके जनवादी अधिकारों को लेखन के मंच पर उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्ति प्रदान की। परसाई ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा परंतु साहित्य जगत में परसाई की ख्याति एक महान व्यंग्यकार के रूप में अधिक है। हरिशंकर परसाई की प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं-- 'हँसते हैं रोते हैं', 'भूत के पाँव', 'तब की बात और थी', 'जैसे उनके दिन फिरे', 'सदाचार का ताबीज', 'पगडंडियों का जमाना', ' रानी नागफनी की कहानी', 'वैष्णव की फिसलन', 'ठिठुरता हुआ लोकतंत्र', 'अपनी अपनी बीमारी', 'निठल्ले की डायरी', 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ', 'बोलती रेखाएँ', 'एक  लड़की पाँच दीवाने', 'तिरछी रेखाएँ', 'और अंत में', 'तट की खोज', 'माटी कहे कुम्हार से', 'पाखंड का अध्यात्म', 'सुनो भई साधो', 'विकलांग श्रद्धा का दौर'', 'परसाई रचनावली (छ: खण्ड)। परसाई जी ने अपने समय की धर्मयुग, सारिका और नयी दुनिया जैसी पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अनेक कॉलम भी लिखे। परसाई जी की रचनाओं के अनुवाद देशी-विदेशी अनेक भाषाओं में हो चुके हैं। उनका निधन 10 अगस्त 1995 को हुआ|

"परसाई जी की रचनाएं राजनीति, साहित्य, भ्रष्टाचार, आजादी के बाद का ढोंग, आज के जीवन का अन्तर्विरोध, पाखंड और विसंगतियों को हमारे सामने इस तरह खोलती हैं जैसे कोई सर्जन चाकू से शरीर काट-काटकर गले अंग आपके सामने प्रस्तुत करता है। उसका व्यंग्य मात्र हँसाता नहीं है, वरन् तिलमिलाता है और सोचने को बरबस बाध्य कर देता है। कबीर जैसी उनकी अवधूत और निःसंग शैली उनकी एक विशिष्ट उपलब्धि है और उसी के द्वारा उनका जीवन चिंतर मुखर हुआ है। उनके जैसा मानवीय संवेदना में डूबा हुआ कलाकार रोज पैदा नहीं होता। आजादी के पहले का हिंदुस्तान जानने के लिए सिर्फ प्रेमचन्द्र पढ़ना ही काफी है, उसी तरह आजादी के बाद का पूरा दस्तावेज परसाई की रचनाओं में सुरक्षित है। चश्मा लगाकर ‘रामचंद्रिका’ पढ़ाने वाले पेशेवर हिंदी के ठेकेदारों के बावजूद, परसाई का स्थान हिन्दी में हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित है।"


कहानियाँ

जैसे उनके दिन फिरे (कहानी संग्रह)
भोलाराम का जीव
हँसते हैं रोते हैं (कहानी संग्रह)

उपन्यास

ज्वाला और जल
तट की खोज
रानी नागफनी की कहानी

संस्मरण

तिरछी रेखाएँ

मरना कोई हार नहीं होती
सीधे-सादे और जटिल मुक्तिबोध

लेख

आवारा भीड़ के खतरे
ऐसा भी सोचा जाता है
अपनी अपनी बीमारी
माटी कहे कुम्हार से
काग भगोड़ा
सदाचार का ताबीज
प्रेमचन्द के फटे जूते
वैष्णव की फिसलन
ठिठुरता हुआ गणतंत्र
पगडण्डियों का जमाना
शिकायत मुझे भी है
तुलसीदास चंदन घिसैं
हम एक उम्र से वाकिफ हैं
तब की बात और थी
भूत के पाँव पीछे
बेइमानी की परत

हास्य-व्यंग्य

विकलांग श्रद्धा का दौर
दो नाक वाले लोग
आध्यात्मिक पागलों का मिशन
क्रांतिकारी की कथा
पवित्रता का दौरा
पुलिस-मंत्री का पुतला
वह जो आदमी है न
नया साल
घायल बसंत
संस्कृति
बारात की वापसी
ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड
उखड़े खंभे
शर्म की बात पर ताली पीटना
पिटने-पिटने में फर्क
बदचलन
एक अशुद्ध बेवकूफ
भारत को चाहिए जादूगर और साधु
भगत की गत
मुण्डन
इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर
तट की खोज
खेती
एक मध्यमवर्गीय कुत्ता
सुदामा का चावल
अकाल उत्सव
खतरे ऐसे भी
कंधे श्रवणकुमार के
दस दिन का अनशन
अपील का जादू

बाल-कहानी

चूहा और मैं
चिट्ठी-पतरी
मायाराम सुरजन

लघुकथाएँ

चंदे का डर
अपना-पराया
दानी
रसोई घर और पाखाना
सुधार
समझौता
यस सर

अश्लील

Tuesday, April 25, 2017

Ajj Aakhaan Waris Shah Nu

Ajj Aakhaan Waris Shah Nu  is a famous dirge by the renowned Punjabi writer and poet Amrita Pritam (1919-2005) about the horrors of the partition of the Punjab during the 1947 Partition of India. The poem is addressed to the historic Punjabi poet Waris Shah (1722-1798 CE), who had written the most popular version of the Punjabi love tragedy, Heer Ranjha It appeals to Waris Shah to arise from his grave, record the Punjab's tragedy and turn over a new page in Punjab's history. (from wikipedia)




Aj aakhan waaris shah noo kito.N qabra.N vicho.N bol!
Te aj kitab-e-ishq da koi agla varka phol!

Ik roi si dhii punjab dii tuu likh-likh mare vain
Aj lakkha.N dheeyan rondian tainuu.N waaris shah noon kahan

Uth darmandan diaa dardiiaa uth tak apna punjaab!
Aj bele laashaa.N vichiiaa.N te lahu dii bharii chenaab!

Kise ne panja paania.N vich dittii zehar rala!
Te unhaa.N paaniaa.N dharat nuu.N dittaa paanii laa!

Es jarkhej zameen te loo.N loo.N phutiaa zehar
Gith gith chadiaa.N laliyaa.N , fut fut chadiaa kehar

Vihoo.N vilissi vaa fir van van vaggi ja
Ohne har ik baans di vanjhli ditti naag bnaa

Naaga.N keele lok moo.Nh bus fir dang hi dang
Plo plii panjab de neele pai gye ang

Ve glio.N tutte geet fir traklio.N tutti tand
Trinjhno.N tuttia.N sahelian charkhde ghookar band

Sne sej de bediya.An ludhan dittian rodh
Sne dalia.N peengh ajj piplaa.N diti tod

Jitthe vajdii phuuk pyaar di ve oh vanjhli gayi guaach
Ranjhe de sab veer aj bhul gaye usdi jaach

Dharti te lahu vasiya, qabran payiyan chon
Preet diyan shaahazaadiiaa.N aj vich mazaaraa.N ron

Ve aj sab ‘qaido’ ban gaye, husn ishq de chor
Aj kitho.N liaaiie labbh ke waaris shah ik hor

Aj aakhan waaris shah noon kito.N qabra.N vicho.N bol!
Te aj kitab-e-ishq da koi agla varka phol!

Lyrics contribution: Pramod Varma and Manoj Sharma

Translation

I say to Waris Shah today, speak from your grave
And add a new page to your book of love

Once one daughter of Punjab wept, and you wrote your long saga;
Today thousands weep, calling to you Waris Shah:

Arise, o friend of the afflicted; arise and see the state of Punjab,
Corpses strewn on fields, and the Chenaab flowing with much blood.

Someone filled the five rivers with poison,
And this same water now irrigates our soil.

Where was lost the flute, where the songs of love sounded?
And all Ranjha’s brothers forgotten to play the flute.

Blood has rained on the soil, graves are oozing with blood,
The princesses of love cry their hearts out in the graveyards.

Today all the Quaido’ns have become the thieves of love and beauty,
Where can we find another one like Waris Shah?

Waris Shah! I say to you, speak from your grave
And add a new page to your book of love.


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