Wednesday, May 5, 2010

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे


आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं
झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे

रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ
शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे

नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं
देस ही की याद है बस गत मुझे

दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल
मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे

अकबर इलाहाबादी

रोज़े-रिन्दी = शराब पीने का दिन
नसीबे-दीगराँ = दूसरों की क़िस्मत में
क़ूवत = ताक़त

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