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Sunday, January 8, 2017

व्यंग्य: आलस्य-भक्त by Babu Gulabrai

अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम ।। 1

प्रिय ठलुआ-वृंद! यद्यपि हमारी सभा समता के पहियों पर चल रही है और देवताओं की भांति हममें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, तथापि आप लोगों ने मुझे इस सभा का पति बनाकर मेरे कुंआरेपन के कलंक को दूर किया है। नृपति और सेनापति होना मेरे स्‍वप्‍न से भी बाहर था। नृपति नहीं तो नारी-पति होना प्रत्‍येक मनुष्‍य की पहुंच के भीतर है, किंतु मुझ-ऐसे आलस्‍य-भक्‍त के लिए विवाह में पाणिग्रहण तक का तो भार सहना गम्‍य था। उसके आगे सात बार अग्नि की परिक्रमा करना जान पर खेलने से कम न था। जान पर खेल कर जान का जंजाल खरीदना मूर्खता ही है - 'अल्‍पस्‍य हेतोर्बहु हातुमिच्‍छन्, विचारमूढ: प्रतिभासि मे त्‍वम्' का कथन मेरे ऊपर लागू हो जाता। 'ब्‍याहा भला कि क्‍वांरा' - वाली समस्‍या ने मुझे अनेक रात्रि निद्रा देवी के आलिंगन से वंचित रखा था, किंतु जब से मुझे सभापतित्‍व का पद प्राप्‍त हुआ है, तब से यह समस्‍या हल हो गई है। आलसी के लिए इतना ही आराम बहुत है। यद्यपि मेरे सभापति होने की योग्‍यता में तो आप लोगों को संदेह करने के लिए कोई स्‍थान नहीं है, तथापि आप लोगों को अपने सिद्धांतों को बतला अपनी योग्‍यता का परिचय देना अनुचित न होगा।
वैसे तो आलसी के लिए इतने वर्णन का भी कष्‍ट उठाना उसके धर्म के विरुद्ध है, किंतु आलस्‍य के सिद्धांतों का प्रचार किए बिना संसार की विशेष हानि होगी और मेरे भी पेट में बातों के अजीर्ण होने की संभावना है। इस अजीर्ण-जन्‍य कष्‍ट के भय से मैंने अपनी जिह्वा को कष्‍ट देने का साहस किया है।
मनुष्‍य-शरीर आलस्‍य के लिए ही बना है। यदि ऐसा न होता, तो मानव-शिशु भी जन्‍म से मृग-शावक की भांति छलांगें मारने लगता, किंतु प्रकृति की शिक्षा को कौन मानता है। नई-नई आवश्‍यकताओं को बढ़ाकर मनुष्‍य ने अपना जीवन अस्‍वाभाविक बना लिया है। मनुष्‍य ही को ईश्‍वर ने पूर्ण आराम के लिए बनाया है। उसी की पीठ खाट के उपयुक्‍त चौड़ी बनाई है, जो ठीक उसी से मिल जावे। प्राय: अन्‍य सब जीवधारी पेट के बल आराम करते हैं। मनुष्‍य चाहे पेट की सीमा से भी अधिक भोजन कर ले, उसके आराम के अर्थ पीठ मौजूद है। ईश्‍वर ने तो हमारे आराम की पहले ही से व्‍यवस्‍था कर दी है। हम ही उसका पूर्ण उपयोग नहीं कर रहे हैं।
निद्रा का सुख समाधि-सुख से अधिक है, किंतु लोग उस सुख को अनुभूत करने में बाधा डाला करते हैं। कहते हैं कि सवेरे उठा करो, क्‍योंकि चिडियां और जानवर सवेरे उठते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि वे तो जानवर हैं और हम मनुष्‍य हैं। क्‍या हमारी इतनी भी विशेषता नहीं कि सुख की नींद सो सकें! कहां शय्या का स्‍वर्गीय सुख और कहां बाहर की धूप और हवा का असह्य कष्‍ट! इस बात के ऊपर निर्दयी जगाने वाले तनिक भी ध्‍यान नहीं देते। यदि उनके भाग्‍य में सोना नहीं लिखा है, तो क्‍या सब मनुष्‍यों का एक-सा ही भाग्‍य है! सोने के लिए लोग तरसा करते हैं और सहस्रों रुपया डॉक्‍टरों और दवाइयों में व्‍यय कर डालते हैं और यह अवैतनिक उपदेशक लोग स्‍वाभाविक निद्रा को आलस्‍य और दरिद्रता की निशानी बतलाते हैं। ठीक ही कहा है - 'आए नाग न पूजिए बामी पूजन जाएं।' लोग यह समझते हैं कि हम आलसियों से संसार का कुछ भी उपकार नहीं होता। मैं यह कहता हूं कि यदि मनुष्‍य में आलस्‍य न होता, तो वह कदापि उन्‍नति न करता और जानवरों की भांति संसार में वृक्षों के तले अपना जीवन व्‍यतीत करता। आलस्‍य के कारण मनुष्‍य को गाड़ियों की आवश्‍यकता पड़ी। यदि गाड़ियां न बनतीं, तो आजकल वाष्‍प-यान और वायुयान का भी नाम न होता। आलस्‍य के ही कारण मनुष्‍य को तार और टेलीफोन का आविष्‍कार करने की आवश्‍यकता हुई। अंग्रेजी में एक उक्ति ऐसी है कि Necessity is the mother of invention अर्थात आवश्‍यकता आविष्‍कार की जननी है, किंतु वे लोग यह नहीं जानते कि आवश्‍यकता आलस्‍य की आत्‍मजा है। आलस्‍य में ही आवश्‍यकताओं का उदय होता है। यदि आप स्‍वयं जाकर अपने मित्रों से बातचीत कर आवें, तो टेलीफोन की क्‍या आवश्‍यकता थी? यदि मनुष्‍य हाथ से काम करने का आलस्‍य न करता, तो मशीन को भला कौन पूछता? यदि हम आलसी लोगों के हृदय की आंतरिक इच्‍छा का मारकोनी साहब को पता चल गया, तो शीघ्र ही ऐसे यंत्र का आविष्‍कार जो जावेगा, जिसके द्वारा हमारे विचार पत्र पर स्‍वत: अंकित हो जाया करेंगे। फिर हम लोग बोलने के कष्‍ट से भी बच जावेंगे। विचार की तरंगों को तो वैज्ञानिक लोगों ने सिद्ध कर ही दिया है। अब कागज पर उनका प्रभाव डालना रह गया। दुनिया के बड़े-बड़े आविष्‍कार आलस्‍य और ठलुआ-पंथी में ही हुए हैं। वाट साहब ने (जिन्‍होंने कि वाष्‍प शक्ति का आविष्‍कार किया है) अपने ज्ञान को एक ठलुआ बालक की स्थिति से ही प्राप्‍त किया था। न्‍यूटन ने भी अपना गुरुत्‍वाकर्षण का सिद्धांत बेकारी में ही पाया था। दुनिया में बहुत बड़ी-बड़ी कल्‍पनाएं उन्‍हीं लोगों ने की हैं, जिन्‍होंने चारपाई पर पड़े-पड़े ही जीवन का लक्ष्‍य पूर्ण किया है। अस्‍तु, संसार को लाभ हो या हानि हो, इससे हमको प्रयोजन ही क्‍या? यह तो सांसारिक लोगों के संतोष के लिए हमने कह दिया, नहीं तो हमको अपने सुख से काम है। यदि हम सुखी हैं, तो संसार सुखी है। ठीक ही कहा है कि 'आप सुखी, तो जग सुखी।' सुख का पूरा-पूरा आदर्श वेदांत में बतलाया है। उस सुख के आदर्श में पलक मारने का भी कष्‍ट उठाना महान पाप है। अष्‍टावक्र गीता में कहा है-
व्‍यापारे खिद्यते यस्‍तु निमेषोन्‍मेषयोरपि;
तस्‍यालस्‍यधुरीणस्‍य सुख नान्‍यस्‍य कस्‍यचित्।
(षोडश प्रकरण, श्‍लोक 4)
अर्थात जो पुरुष नेत्रों के निमेष-उन्‍मेष के व्‍यापार (नेत्रों के खोलने-मूंदने) में ही परिश्रम मानकर दु:खित होता है, इस परम आलसी एवं ऐसे निष्क्रिय पुरुष को ही परम सुख मिलता है, अन्‍य किसी को नहीं।
लोग कहते हैं कि ऐसे ही आलस्‍य के सिद्धांतों ने भारतवर्ष का नाश कर दिया है। परंतु वे यह नहीं जानते कि भारतवर्ष का नाश इसलिए नहीं हुआ कि कि वह आलसी है वरन इसलिए कि अन्‍य देशों में इस आलस्‍य के स्‍वर्ण-सिद्धांत का प्रचार नहीं हो पाया है। यदि उन देशों को भी भारत की यह शिक्षा-दीक्षा मिल गई होती, तो वे शय्या-जन्‍य नैसर्गिक सुख को त्‍याग यहां आने का कष्‍ट न उठाते। यदि बिना हाथ-पैर चलाए लेटे रहने में सुख मिल सकता है, तो कष्‍ट उठाने की आवश्‍यकता ही क्‍या? बेचारे अर्जुन ने ठीक ही कहा था कि युद्ध द्वारा रक्‍त-रंजित राज्‍य को प्राप्‍त करके मैं अश्रेय का भागी बनना नहीं चाहता। वे वास्‍तव में आराम से घर बैठना चाहते थे, किंतु वह भी कृष्‍णजी के बढ़ावे में आ गए और 'यशो लभस्‍व' के आगे उनकी कुछ भी न चल सकी। फिर फल क्‍या हुआ कि सारे वंश का नाश हो गया। इस युद्ध का कृष्‍ण भगवान को भी अच्‍छा फल मिल गया। उनका वंश भी पहले की लड़ाई में नष्‍ट हो गया।
महाभारत में कहा है कि-
'दु:खादुद्विजते सर्व: सुखं सर्वस्‍य चेप्सितम्।'
अर्थात दु:ख से सब लोग भागते हैं एवं सुख को सब लोग चाहते हैं। हम भी इसी स्‍वाभाविक नियम का पालन करते हैं। इन सिद्धांतों से तो आपको प्रकट हो गया होगा कि संसार में आलस्‍य कितना महत्‍व रखता है। इसमें संसार की हानि ही क्‍या? मैंने अपने सिद्धांतों के अनुकूल जीवन व्‍यतीत करने के लिए कई मार्ग सोचे, किंतु अभाग्‍य-वश वह पूर्णतया सफल न हुए, इसमें मेरा दोष नहीं है। इसमें तो संसार ही का दोष है; क्‍योंकि वह इन सिद्धांतों के लिए अभी परिपक्‍व नहीं है। अस्‍तु, वर्तमान अवस्‍था में बिना उद्योग के भी बहुत कुछ सुख मिल सकता है। उद्योग करके सुख प्राप्‍त किया, तो वह किस काम का? आलसी जीवन के लिए सबसे अच्‍छा स्‍थान तो शफाखाने की चारपाई है। एक बार मेरा विचार हुआ था कि किसी बहाने से युद्धक्षेत्र में पहुंच जाऊं तथा वहां पर थोड़ी-बहुत चोट खाकर शफाखाने के किसी पलंग में स्‍थान मिल जाए, किंतु लड़ाई के मैदान तक जाने का कष्‍ट कौन उठावे और बिना गए तो उन पलंगों का उपभोग करना इतना ही दुर्लभ है, जितना पापी के लिए स्‍वर्ग।
भाग्‍य-वश मुझे एक समय आपरेशन कराने की आवश्‍यकता पड़ गई, और थोड़े दिनों के लिए बिना युद्धक्षेत्र गए ही मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया; किंतु पुण्‍य-क्षीण होने पर शफाखाना छोड़ना पड़ा। मैं बहुत चाहता था कि मुझे जल्‍दी आराम न हो, किंतु डॉक्‍टर लोग मानने वाले जीव थोड़े ही हैं; अतिशीघ्र आराम कराके मुझे विदा कर दिया, मानो मेरे आराम से स्‍पर्धा होती थी। तब से फिर ऐसे सुअवसर की बाट जोह रहा हूं कि मुझे वहीं पलंग प्राप्‍त हो, जहां पर कि मल-मूत्र त्‍याग करने के लिए भी स्‍थान छोड़ने का कष्‍ट न उठाना पड़े। खैर, अब भी जहां तक होता है, मैं शय्या की सेवा से अपने को विमुख नहीं रखता। मेरा सब कारबार, भोजन एवं कसरत भी उसी सुख-निधान पलंग पर हो जाती है। कभी-कभी नहाने-धोने के‍ लिए उससे वियोग होता है, तो उसको एक आवश्‍यक बुराई समझकर जैसे-तैसे स्‍वीकार कर लेता हूं। धन्‍य हैं तिब्‍‍बत के लोग, जिन्‍हें नहाने का कष्‍ट नहीं उठाना पड़ता। ईश्‍वर ने न जाने मेरा जन्‍म वहां क्‍यों नहीं दिया? तिब्‍‍बत का प्राचीन नाम त्रिविष्‍टप था। शायद इसी सुख के कारण वही बैकुंठ कहलाता है। बैकुंठ को लोग क्‍यों चाहते हैं, क्‍योंकि वहां आलस्‍य-धर्म का पूर्णतया पालन हो सकता है। वहां किसी बात का कष्‍ट ही नहीं उठाना पड़ता। कामधेनु और कल्‍पवृक्ष को ईश्‍वर ने हमारे ही निमित्त निर्माण किया है। आजकल कलियुग में और भी सुभीता हो गया है। अब स्‍वर्ग तक कष्‍ट करने की भी आवश्‍यकता नहीं। कल्‍पवृक्ष बिजली के बटन के रूप में महीतल पर अवतरित हो गया है। बटन दबाइए पंखा चलने लगा, झाड़ू भी लग जावेगा, यहां तक कि पका-पकाया भोजन भी तैयार होकर हाजिर हो जावेगा। बिना परिश्रम के चौथी-पांचवीं मंजिल पर लिफ्ट द्वारा पहुंच जाते हैं। यह सब आलस्‍य की ही आवश्‍यकताओं को पूर्ण करने के लिए संसार में उन्‍नति का क्रम चला है; और उन्‍नति में गौरव मानने वाले लोगों को हम आलसियों का अनुगृहीत होना चाहिए।
उपर्युक्‍त व्‍यवस्‍था से प्रकट हो गया कि आलस्‍य का इस संसार में इतना महत्‍व है। अब मैं आप महानुभावों के शिक्षार्थ एक आदर्श आलस्‍याचार्य का वर्णन कर अपने वक्‍तव्‍य को समाप्‍त करूंगा। क्‍योंकि मैं समझता हूं कि आप लोगों की पीठें शय्या के लिए बहुत ही उत्‍सुक हो रही होंगी।
कहा जाता है कि एक बड़े भारी आलसी थे। वह जहां तक होता था, हाथ क्‍या अपनी उंगली को भी कष्‍ट नहीं देना चाहते थे। उनके मित्र वर्ग ने उनसे तंग आकर सोचा कि इनको जीवित ही कब्र की शांतिमयी निद्रा का सुख प्राप्‍त करा दें। इस इरादे से वह उनको चारपाई पर रख ले चले। रास्‍ते में एक धनाढ्य महिला मिली। उसने जब यह शव-सा जाता हुआ मनुष्‍य देखा, तो उसका कुतूहल बहुत बढ़ा और उसने शय्या-वाहकों से सब वृत्तांत पूछा। उस दयामयी स्‍त्री ने हमारे चरित्र नायक से कहा कि आप मेरे यहां चलने की कृपा कीजिए। मैं आपको बिना कष्‍ट के ही भोजनादि से संतुष्‍ट करती रहूंगी। हमारे आलस्‍याचार्य ने पूछा कि आप मुझे भोजन में क्‍या-क्‍या देवेंगी? उस महिला ने बहुत-से पदार्थों का नाम लिया, उनमें उबले हुए आलू भी थे। इस पर उन्‍होंने कहा कि आलुओं को छीलेगा कौन? (लंच में कभी-कभी बिना छिले ही आलू देते हैं।) इस पर उस स्‍त्री को बहुत झुंझलाहट आई। हमारे आलस्‍याचार्य ने कहा कि मैं तो पहले ही से जानता था कि आप मेरी सहायता न कर सकेंगी और आपने वृथा मेरा समय नष्‍ट किया, नहीं तो मैं अभी तक आटर्यन आनंद-भवन में प्रवेश कर चुका होता। इतना कहकर उन्‍होंने शय्या-वाहकों को आगे चलने की आज्ञा दी।
इस आदर्श को मूर्खता न समझिए। वेदांत का मोक्ष और बौद्ध-निर्वाण इससे भिन्‍न नहीं है। भेद केवल इतना ही है कि इस प्रकार के जीवन को दार्शनिक रूप नहीं दिया गया है। इसलिए आप लोग जो इस सभा के सदस्‍य हैं, मेरे सिद्धांतों से सहमत हो निम्‍नलिखित प्रस्‍तावों को स्‍वीकार करें-
यह सभा प्रस्‍ताव करती है कि भारत-सरकार के कानून-विभाग से यह प्रार्थना की जावे कि ताजीरात-हिंद में एक धारा बढ़ाकर दिन-रात में दस घंटों से कम सोना दंडनीय बनाया जावे, क्‍योंकि कम सोने वाला मनुष्‍य आत्‍म-हत्‍या का दोषी होता है।
यह सभा प्रस्‍ताव करती है कि जो लोग ताश खेलना नहीं जानते हैं अथवा जो लोग तंबाकू न पीते हों, उन लोगों पर आमदनी के 5/- रुपए प्रतिशत के हिसाब से कर लगाने की प्रार्थना की जावे। इससे सरकार की आमदनी बढ़ेगी। इसके सिवा लोगों को ठलुआ-पंथी से अरुचि न होगी।
यह सभा प्रस्‍ताव करती है कि जो लोग इस सभा में रुपया-पैसा कमाने या और कोई उपयोगी बात जिसकी कीमत आने-पाइयों में हो सकती है, कहेंगे, वे इस सभा से बहिष्‍कृत कर दिए जावेंगे।
यह सभा प्रस्‍ताव करती है कि अमेरिका और इंग्‍लैंड की मोटर-कंपनियों से निवेदन किया जावे कि भविष्‍य में जो मोटरें बनवाई जावें वे ऐसी हों कि उनमें पैर पसारकर लेटे हुए सफर कर सकें। इसके अतिरिक्‍त ऐसी छोटी-छोटी मोटर-मशीनें तैयार करवाई जावें कि वे हमारी चारपाइयों में लगाई जा सकें और बटन दबाने से हमारी चारपाई एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक जा सके। पहले लोगों की कल्‍पना शक्ति अच्‍छी थी। वे वायुयान को उड़नखटोला कहते थे। खटिया नहीं, तो खटोला अवश्‍य ही था। उड़नखटोला के स्‍थान में मोटर-पलंगों की आयोजना संसार की उन्नति के लिए परमावश्‍यक है।
यह सभा प्रस्‍ताव करती है कि सरकार से यह प्रार्थना की जावे कि संसार में सबसे बड़े शांति-स्‍थापनकर्ता को जो नोबिल प्राइज़ मिलती है, वह सबसे बड़े आलसी को दिया जावे; क्‍योंकि आलसियों के बराबर संसार में दूसरा कोई भी शांति-स्‍थापनकर्ता हो ही नहीं सकता। यदि वह इनाम काम करने वाले शक्तिशाली पुरुष को दिया जावेगा, तो वह कैसर की भांति संसार में युद्ध की ज्‍वाला को प्रचंड कर पुरस्‍कार-दाता की आत्‍मा को दु:ख देगा।
गुलाब राय
जन्म : 17 जनवरी 1888, इटावा (उत्तर प्रदेश), निधन : 13 अप्रैल 1963, आगरा (उत्तर प्रदेश)
भाषा : हिंदी, विधाएँ : व्यंग्य, कहानी, निबंध, आलोचना, दर्शनशास्त्र
आलोचना : नवरस, हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास, हिंदी नाट्य विमर्श, आलोचना कुसुमांजलि, काव्य के रूप : सिद्धांत और अध्ययन
दर्शन शास्त्र : कर्तव्यशास्त्र, तर्कशास्त्र, बौद्ध धर्म, पाश्चात्य दर्शनों का इतिहास, भारतीय संस्कृति की रूपरेखा
निबंध संग्रह : प्रबंध प्रभाकर जीवन-पशु, ठलुआ क्लब, मेरी असफलताएँ, मेरे मानसिक उपादान
बाल साहित्य : विज्ञान वार्ता, बाल प्रबोध
संपादन : सत्य हरिश्चंद्र, भाषा-भूषण, कादंबरी कथा-सार
बाबू गुलाबराय की भाषा शुद्ध तथा परिष्कृत खड़ी बोली है। उसके मुख्यतः दो रूप देखने को मिलते हैं - क्लिष्ट तथा सरल। विचारात्मक निबंधों की भाषा क्लिष्ट और परिष्कृत हैं। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है, भावात्मक निबंधों की भाषा सरल है। उसमें हिंदी के प्रचलित शब्दों की प्रधानता है साथ उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। कहावतों और मुहावरों को भी अपनाया है। बाबू गुलाबराय ने अपने निबंधों की नीरसता को दूर करने के लिए गंभीर विषयों के वर्णन में हास्य और व्यंग्य का पुट भी दिया है। गुलाबराय जी की भाषा आडंबर शून्य है। संस्कृत के प्रकांड पंडित होते हुए भी गुलाबराय जी ने अपनी भाषा में कहीं भी पांडित्य-प्रदर्शन का प्रयत्न नहीं किया। संक्षेप में गुलाब राय जी का भाषा संयत, गंभीर और प्रवाहपूर्ण है। बाबू गुलाबराय को साहित्यिक सेवाओं के फलस्वरूप 'आगरा विश्वविद्यालय' ने उन्हें 'डी. लिट.' की उपाधि से सम्मानित किया था। उनके सम्मान में भारतीय डाकतार विभाग ने 22 जून, 2002 को एक डाक टिकट जारी किया जिसका मूल्य 5 रुपये था और जिस पर बाबू गुलाबराय के चित्र के साथ उनकी तीन प्रमुख पुस्तकों को भी प्रदर्शित किया गया था।


1 यह लोकोक्ति एक प्रचलित कहावत है। अर्थ- अजगर को किसी की नौकरी नहीं करनी होती और पक्षी को भी कोई काम नहीं करना होता, ईश्वर ही सबका पालनहार है, इसलिए कोई भी काम मत करो ईश्वर स्वयं देगा। आलसी लोगों के लिए श्री मलूकदास जी का ये कथन बहुत ही उचित है। मलूकदासजी कर्मयोगी संत थे. स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया उसका मुकाबला किताबी ज्ञान नहीं कर सकता. औरंगजेब जैसा पशुवत मनुष्य भी उनके सत्संग का सम्मान करता था. आज उनके बारे में ही बात करते हैं. शुरू में संत मलूकदासजी नास्तिक थे. उनके गांव में एक साधु आए और आकर टिक गए. साधुजी लोगों को रामायण सुनाते थे. प्रतिदिन सुबह-शाम गांववाले उनका दर्शन करते और उनसे राम कथा का आनंद लेते. संयोग से एक दिन मलूकदास भी रामकथा में पहुंचे. उस समय साधु महाराजा ग्रामीणों को श्रीराम की महिमा बताते कह रहे थे- श्रीराम संसार के सबसे बड़े दाता है. वह भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं. मलूकदास ने भी साधु की यह बात सुनी पर उनके पल्ले नहीं पड़ी. उन्होंने अपना विरोध जताते तर्क किया- क्षमा करे महात्मन! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, कोई काम न करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे? साधु ने पूरे विश्वास के साथ कहा- अवश्य देंगे. उनकी दृढता से मलूकदास के मन में एक और प्रश्न उभरा तो पूछ बैठे- यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब? साधु ने दृढ़ता के साथ कहा- तब भी श्रीराम भोजन देंगे! बात मलूकदास को लग गई. अब तो श्रीराम की दानशीलता की परीक्षा ही लेनी है. पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए. चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे. कंटीली झाड़ियां थीं. दूर-दूर तक फैले जंगल में धीरे-धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुप गया. चारों तरफ अंधेरा फैल गया, मगर न मलूकदास को भोजन मिला, न वह पेड़ से ही उतरे. सारी रात बैठे रहे. अगले दिन दूसरे पहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी. वह सतर्क होकर बैठ गए. थोड़ी देर में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे. वे सब उसी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े. उन्होंने भोजन का मन बनाया. उसी समय जब एक अधिकारी थैले से भोजन का डिब्बा निकाल रहा था, शेर की जबर्दस्त दहाड़ सुनाई पड़ी. दहाड़ का सुनना था कि घोड़े बिदककर भाग गए. अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देखा, फिर भोजन छोड़कर वे भी भाग गए. मलूकदास पेड़ से ये सब देख रहे थे. वह शेर की प्रतीक्षा करने लगे. मगर दहाड़ता हुआ शेर दूसरी तरफ चला गया. मलूकदास को लगा, श्रीराम ने उसकी सुन ली है अन्यथा इस घनघोर जंगल में भोजन कैसे पहुंचता? मगर मलूकदास तो मलूकदास ठहरे. उतरकर भला स्वयं भोजन क्यों करने लगे! वह तो भगवान श्रीराम को परख रहे थे. तीसरे पहर में डाकुओं का एक बड़ा दल उधर से गुजरा. पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पड़े भोजन को देखकर डाकू ठिठक गए. डाकुओं के सरदार ने कहा- भगवान श्रीराम की लीला देखो. हम लोग भूखे हैं और भोजन की प्रार्थना कर रहे थे. इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन भेज दिया. इसे खा लिया जाए तो आगे बढ़ें. मलूकदास को हैरानी हुई कि डाकू भी श्रीराम पर इतनी आस्था रखते हैं कि वह भोजन भेजेंगे. वह यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें डाकुओं की बात में कुछ शंका सुनाई पड़ी. डाकू स्वभावतः शकी होते हैं. एक साथी ने सावधान किया- सरदार, इस सुनसान जंगल में इतने सजे-धजे तरीके से सुंदर बर्तनों में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्यमय लग रहा है. कहीं इसमें विष न हो. यह सुनकर सरदार बोला- तब तो भोजन लाने वाला आसपास ही कहीं छिपा होगा. पहले उसे तलाशा जाए. सरदार के आदेश पर डाकू इधर-उधर तलाशने लगे. तभी एक डाकू की नजर मलूकदास पर पड़ी. उसने सरदार को बताया. सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं. उसने घुड़ककर कहा- दुष्ट! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है! चल उतर. सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गए मगर उतरे नहीं. वहीं से बोले- व्यर्थ दोष क्यों मंढ़ते हो? भोजन में विष नहीं है. सरदार ने आदेश दिया- पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ. झूठ-सच का पता अभी चल जाता है. आनन-फानन में तीन-चार डाकू भोजन का डिब्बा उठाए पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखाकर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया. मलूकदास ने स्वादिष्ट भोजन कर लिया. फिर नीचे उतरकर डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया. डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया. वह स्वयं भोजन से भाग रहे थे लेकिन प्रभु की माया ऐसी रही कि उन्हें बलात भोजन करा दिया. इस घटना के बाद मलूकदास ईश्वर पक्के भक्त हो गए. गांव लौटकर मलूकदास ने सर्वप्रथम एक दोहा लिखा– ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥’ यह दोहा आज खूब सुनाया जाता है. आपके कर्म शुद्ध हैं. आपने कभी किसी का अहित करने की मंशा नहीं रखी तो ईश्वर आपके साथ सबसे ज्यादा प्रेमपूर्ण भाव रखते हैं, चाहे आप उन्हें भजें या न भजें. आपके कर्म अच्छे हैं तो आप यदि मलूकदासजी की तरह प्रभु की परीक्षा लेने लगे तो भी वह इसका बुरा नहीं मानते. आपके सत्कर्मों का सम्मान करते स्वयं परीक्षा देने आ जाते हैं. छोटे-बड़े की भावना ईश्वर में नहीं होती. ये विकार तो मनुष्य को क्षीण करते हैं.

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