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Wednesday, May 5, 2010

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे


आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं
झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे

रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ
शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे

नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं
देस ही की याद है बस गत मुझे

दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल
मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे

अकबर इलाहाबादी

रोज़े-रिन्दी = शराब पीने का दिन
नसीबे-दीगराँ = दूसरों की क़िस्मत में
क़ूवत = ताक़त

Friday, April 30, 2010

इश्क़ की दास्तान है प्यारे

इश्क़ की दास्तान है प्यारे


इश्क़ की दास्तान है प्यारे
अपनी-अपनी ज़ुबान है प्यारे

हम ज़माने से इंतक़ाम तो लें
एक हसीं दर्मियान है प्यारे

तू नहीं मैं हूं मैं नहीं तू है
अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे

रख क़दम फूँक-फूँक कर नादान
ज़र्रे-ज़र्रे में जान है प्यारे


जिगर मुरादाबादी

Friday, May 16, 2008

इश्क़ में इम्तेहान

  वैसे तो आपकी हर अदा से वाकिफ़ है दिलदारा 
   डरते है जब इश्क़ में इम्तेहान  देने की बात हो |

From http://mehhekk.wordpress.com/

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