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Saturday, November 14, 2015

दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा

नवयौवना का सा श्रृंगार प्रकृति, नव निश्छल बहता जा प्रेम पथिक ।
धरा अजर अमर सी वसुंधरा, रस आनन्दित विभोर हुई ।।
सरस रस की कोख में द्रवित, हे सरल सहज सी चेतना ।
नित पल नवश्रृंगार कर, नवयौवना का रूप धर जीवन को आकर्षित करे।।
रह विशाल समुद्र की कोख में, रस सागर को भी कोख धरे ।
कहीं झरते प्रेमरस प्रपात, और कहीं निश्छल बहती प्रेम नद्य।।
प्रेमोद्दत्त हो चूमने को आतुर रसगगन को, पर्वतों के रूप लिये ।
धरा तेरा यह ऊर्जित प्रेम, शौर्य को भी न डिगने दे,नित्यानंद रूप में वो भी।।
कहीं कलकल करतीं गातीं नदियां और कहीं कलरव का गान।
पुष्प अर्पित कर प्रेमी को कर देती अपने निश्छल प्रेम का बखान।।
रस सागर का अनमोल महल यह, अमर प्रेम की सहज गाथा ये।
जीवन को दोनों मिलकर देते अमरत्व ये, नवयौवना प्रकृति और शौर्य।।
हे वसुंधरा के पूतों न करो अपराध, इसका स्वामी बन, यह है दिव्यागंना ।
दिव्य ज्योति का आलिंगन ही, हे समर्थ धारण करने को इसको।।
जीवन भी मात्र एक श्रृंगार है धरा का, बरसाता जो दिव्य प्रेम गगन।
क्षणिक कल्पना सी चिंगारी, क्यों स्वामी वन धरा के महापराध करते हो ।।
दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा, प्रेम.. पुरूष और प्रकृति का।
रसानन्द रसराज रससमुद्र का बस जीवनपर्यंत रसनाओं से आनन्द लो।।
रस हो रस में रस से भरे रसिक रहो, रस के रसायन से रसवान बनो।
जीवन प्रेम रस का पान करो, न स्वामी बन अपमान करो, पूत हो पूत रहो ।।

Sunday, February 17, 2008

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है
झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है.

पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा
बेपर वो शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है.

अपनी नज़र से ख़ुद को देखूं तो मान भी लूं
आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है.

हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत
रिश्वत का दौर अब भी उनको चला रहा है.

बुझता चिराग़ दिल में, किसने ये जान डाली
फिर से हवा के रुख़ पे ये झिलमिला रहा है.

पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी
कुछ नाम देके आदम उलझन बढ़ा रहा है.

बरसों की वो इमारत, अब हो गयी पुरानी
कुछ रंग-रौगनों से उसको सज़ा रहा है.

देवी नांगरानी

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था.

जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं

छोटे से एक घर में ही सारा जहान था.

शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह

हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.

तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत

तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था.

कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ

बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था

------देवी नांगरानी

Tuesday, February 5, 2008

जब यह दीप थके


छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ तथा आधुनिक मीरा के नाम से जाने जानी वाली कवियत्री द्वारा रचित जब यह दीप थके


जब यह दीप थके


जब यह दीप थके तब आना।


यह चंचल सपने भोले है,

दृग-जल पर पाले मैने, मृदु

पलकों पर तोले हैं;

दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना!


साधें करुणा-अंक ढली है,

सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर

पावस की सजला बदली है;

विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!


यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,

सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,

ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;

दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!


यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के

चिर उज्जवल अक्षर जीवन की

बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;

कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!


लौ ने वर्ती को जाना है

वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने

रज का अंचल पहचाना है;

चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!



-----महादेवी वर्मा

प्रमुख काव्य संग्रह

दीपशिखा , प्रथम आयाम , नीहार , रश्मि , नीरजा , सांध्यगीत , अग्निरेखा , दीपगीत , नीलाम्बरा , आत्मिका

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