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Sunday, March 9, 2008

दिन बसन्त के

दिन बसन्त के

राजा-रानी-से तुम दिन बसन्त के

आए हो हिम के दिन बीतते

दिन बसन्त के

पात पुराने पीले झरते हैं झर-झर कर

नई कोंपलों ने शृंगार किया है जी भर

फूल चन्द्रमा का झुक आया है धरती पर

अभी-अभी देखा मैंने वन को हर्ष भर

कलियाँ लेते फलते, फूलते

झुक-झुककर लहरों पर झूमते

आए हो हिम के दिन बीतते

दिन बसन्त के

----  ठाकुरप्रसाद सिंह

Sunday, February 17, 2008

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था.

जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं

छोटे से एक घर में ही सारा जहान था.

शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह

हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.

तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत

तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था.

कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ

बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था

------देवी नांगरानी

Thursday, February 7, 2008

पिछली रात को ....



इंतजार जैसे उसका इमान हो
कुछ एसे ही वो इंतजार करता रहा
उस लहर का, जो छोड़ गयी थी
कल रात कुछ सीपिया तो कुछ मोती जैसे कदमो के निशां

लहरों का क्या है ,
आती है ... चली जाती है
पर उस किनारे का क्या
जो देता है उतना ही प्यार उतना ही दुलार
हर आने वाली उस लहर को
जिसे आख़िर मे चले जाना है

पल भर का साथ था,
फिर मिलन इंतजार
हर लौटती उस लहर को,
जो छोड़ आई थी अपने कदम-ए-निशां
उस किनारे पर, पिछली रात को ….

KS

K. Singh © 2008. All rights are reserved. No part of this Article, including text and photographs, may be copied, reproduced or transmitted without the express permission of the author.

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