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Wednesday, February 6, 2008

सब उन्नति का मूल कारण

 

 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
- भारतेंदु हरिश्चंद्र [आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह]

 

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हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 1 से 5     हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 6 से 8

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Tuesday, February 5, 2008

लो याद आगई वो पहली कविता जो हमने बचपन मे पढी थी, याद आई आप को ...................
"ठो लाल अब आंखें खोलो
पानी लायी मुह धो लो
बीती रात कमल दल फुले
जिनके ऊपर भावारे झूले
चिङिया चहक उठी पेडो पर
बहने लगी हवा सुंदर
नभ में न्यारी लाली छाई
धरती ने प्यारी छवि पायी
ऐसा सुन्दर समय न खो
मेरे प्यारे अब मत सो "



अरे अब तो जागो...................

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