Wednesday, February 22, 2017

सोहन लाल द्विवेदी

सोहन लाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 - 1 मार्च 1988) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हैं। द्विवेदी जी हिन्दी के राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया। महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित, द्विवेदी जी ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं। 1969 में भारत सरकार ने आपको पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।

22 फरवरी सन् 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की तहसील बिन्दकी नामक स्थान पर जन्मे सोहनलाल द्विवेदी हिंदी काव्य-जगत की अमूल्य निधि हैं। उन्होंने हिन्दी में एम.ए. तथा संस्कृत का भी अध्ययन किया। राष्ट्रीयता से संबन्धित कविताएँ लिखने वालो में इनका स्थान मूर्धन्य है। महात्मा गांधी पर आपने कई भाव पूर्ण रचनाएँ लिखी है, जो हिन्दी जगत में अत्यन्त लोकप्रिय हुई हैं। आपने गांधीवाद के भावतत्व को वाणी देने का सार्थक प्रयास किया है तथा अहिंसात्मक क्रान्ति के विद्रोह व सुधारवाद को अत्यन्त सरल सबल और सफल ढंग से काव्य बनाकर 'जन साहित्य' बनाने के लिए उसे मर्मस्पर्शी और मनोरम बना दिया है।

सन् 1941 में देश प्रेम से लबरेज भैरवी, उनकी प्रथम प्रकाशित रचना थी। उनकी महत्वपूर्ण शैली में पूजागीत, युगाधार, विषपान, वासन्ती, चित्रा जैसी अनेक काव्यकृतियाँ सामने आई थी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा तो उसी समय सामने आई थी जब 1937 में लखनऊ से उन्होंने दैनिक पत्र 'अधिकार' का सम्पादन शूरू किया था। चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में “बालसखा” का सम्पादन भी किया था। देश में बाल साहित्य के वे महान आचार्य थे।

1 मार्च 1988 को राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी चिर निद्रा में लीन हो गए।

Wednesday, February 15, 2017

kavya



काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो। अर्थात् वह कला जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है।

Sunday, January 22, 2017

ठुकरा दो या प्यार करो


एक गहन भाव से भरी, एवं समर्पण भाव से आप्लावित,सुभद्रा कुमारी चौहान की यह  कविता " ठुकरा दो या प्यार करो " में उन्होंने इस चिर सत्य का रूप निर्धारित किया है कि पूजा तथा अर्चन के निमित्त किसी वस्तु की जरूरत नही है। मनुष्य के भाव यदि अमल और धवल हैं तो भगवान भक्त को भी उसी दृष्टि से देखता है । अपनी भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर कवयित्री ने इस कविता में यह संदेश देने का प्रयस किया है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं,उन्हे प्रसन्न करने के लिए भक्तों के निर्मल मन का प्रेम ही पर्याप्त है।

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं ।
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं ॥
धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं ।
मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥
मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी ।
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी ॥
धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं ।
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं ॥
मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? है स्वर में माधुर्य नहीं ।
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं ॥
नहीं दान है, नहीं दक्षिणा ख़ाली हाथ चली आयी ॥
पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ! चली आयी ॥
 पूजा और पुजापा प्रभुवर ! इसी पुजारिन को समझो ।
दान दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो ॥
 मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ ।
जो कुछ है, बस यही पास है इसे चढ़ाने आयी हूँ ॥
 चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो ।
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो ॥

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