सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

सब उन्नति का मूल कारण

    निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय । निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय । इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग । और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात । तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय । विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार । भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात । सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय । - भारतेंदु हरिश्चंद्र [ आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह ]   ========================================================================= हिन्दी में ब्लागिंग

जब यह दीप थके

छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ तथा आधुनिक मीरा के नाम से जाने जानी वाली कवियत्री द्वारा रचित जब यह दीप थके जब यह दीप थके जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना! साधें करुणा-अंक ढली है, सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर पावस की सजला बदली है; विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना! यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है, सुधि से सुरभित स्नेह-धुले, ज्वाला के चुम्बन से निखरे है; दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना! यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के चिर उज्जवल अक्षर जीवन की बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के; कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना! लौ ने वर्ती को जाना है वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने रज का अंचल पहचाना है; चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना! -----महादेवी वर्मा प्रमुख काव्य संग्रह दीपशिखा , प्रथम आयाम , नीहार , रश्मि , नीरजा , सांध्यगीत , अग्निरेखा , दीपगीत , नीलाम्बरा , आत्मिका

बूँद

बूँद ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर - फिर यही जी में लगी , आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ? देव मेरे भाग्य में क्या है बदा , मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ? या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी, चू पडूँगी या कमल के फूल में ? बह गयी उस काल एक ऐसी हवा वह समुन्दर ओर आई अनमनी एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला वह उसी में जा पड़ी मोती बनी । लोग यों ही हैं झिझकते , सोचते जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें बूँद लौं कुछ और ही देता है कर । ----------------
लो याद आगई वो पहली कविता जो हमने बचपन मे पढी थी, याद आई आप को ................... " उ ठो लाल अब आंखें खोलो पानी लायी मुह धो लो बीती रात कमल दल फुले जिनके ऊपर भावारे झूले चिङिया चहक उठी पेडो पर बहने लगी हवा सुंदर नभ में न्यारी लाली छाई धरती ने प्यारी छवि पायी ऐसा सुन्दर समय न खो मेरे प्यारे अब मत सो " अरे अब तो जागो...................

चिट्ठाजगत

"चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी "चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

झाँसी की रानी

झाँसी की रानी सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो । यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो । कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को ।। संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना । अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को ।। जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो । दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को ।। निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे। सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे । कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को ।। मैथिलीशरण गुप्त