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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है (ऐ वतन,) करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़ एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है बिस्मिल आजिमाबादी

राही मासूम रज़ा

जन्म: 01 सितंबर 1927 निधन: 15 मार्च 1992 जन्म स्थान गंगौली, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश, भारत कुछ प्रमुख कृतियाँ आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद, दिल एक सादा काग़ज़, अजनबी शहर:अजनबी रास्ते, मैं एक फेरी वाला ग़रीबे शहर राही मासूम रज़ा (१ सितंबर, १९२५-१५ मार्च १९९२) का जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर

Raksha Bandhan | रक्षाबंधन

रक्षाबंधन 

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र प्रतापनारायण मिश्र (सितंबर, 1856 - जुलाई, 1894) भारतेंन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। पंडित जी का जन्म उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव निवासी, कात्यायन गोत्रीय, कान्यकुब्ज ब्राहृमण पं. संकटादीन के घर आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था।वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रतिभारतेंदु" अथवा "द्वितीयचंद्र" कहे जाने लगे थे। बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे और अक्षरारंभ के पश्चात् उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे। किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अँगरेजी मदरसे में भरती करा दिया। तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष

Short stories by मुंशी प्रेमचंद

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या वो दिन भी दिन | Wo bhi kya din

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए । हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए । इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए ।। हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।। क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।। राही मासूम रज़ा
खिसक गयी है धूप पैताने से धीरे-धीरे खिसक गयी है धूप। सिरहाने रखे हैं पीले गुलाब। क्या नहीं तुम्हें भी दिखा इनका जोड़- दर्द तुम में भी उभरा? सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" विश्वेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,लंबोदराय सकलाय जगध्दिताय। नागाननाय श्रुतियग्यविभुसिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥