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दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा

नवयौवना का सा श्रृंगार प्रकृति, नव निश्छल बहता जा प्रेम पथिक । धरा अजर अमर सी वसुंधरा, रस आनन्दित विभोर हुई ।। सरस रस की कोख में द्रवित, हे सरल सहज सी चेतना । नित पल नवश्रृंगार कर, नवयौवना का रूप धर जीवन को आकर्षित करे।। रह विशाल समुद्र की कोख में, रस सागर को भी कोख धरे । कहीं झरते प्रेमरस प्रपात, और कहीं निश्छल बहती प्रेम नद्य।। प्रेमोद्दत्त हो चूमने को आतुर रसगगन को, पर्वतों के रूप लिये । धरा तेरा यह ऊर्जित प्रेम, शौर्य को भी न डिगने दे,नित्यानंद रूप में वो भी।। कहीं कलकल करतीं गातीं नदियां और कहीं कलरव का गान। पुष्प अर्पित कर प्रेमी को कर देती अपने निश्छल प्रेम का बखान।। रस सागर का अनमोल महल यह, अमर प्रेम की सहज गाथा ये। जीवन को दोनों मिलकर देते अमरत्व ये, नवयौवना प्रकृति और शौर्य।। हे वसुंधरा के पूतों न करो अपराध, इसका स्वामी बन, यह है दिव्यागंना । दिव्य ज्योति का आलिंगन ही, हे समर्थ धारण करने को इसको।। जीवन भी मात्र एक श्रृंगार है धरा का, बरसाता जो दिव्य प्रेम गगन। क्षणिक कल्पना सी चिंगारी, क्यों स्वामी वन धरा के महापराध करते हो ।। दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा,

अदीम हाशमी

अदीम हाशमी (जन्म: 1946-निधन: 2002) Adeem Fasihuddin Hashmi (Real name Fasih Ud Din) लोकप्रिय  शायर जिन्होंने जन-भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। References: https://rekhta.org/poets/adeem-hashmi?lang=Hi http://www.poemhunter.com/adeem-hashmi/biography/

नागार्जुन के काव्य में जीवन मूल्य

नागार्जुन के काव्य में जीवन मूल्य/ डा.त्रिवेणी झा/ 2012 (प्रथम संस्करण)/ मिलिंद प्रकाशन, 4-3-178/2,कन्दास्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुलतान बाजार, हैदराबाद – 500 095/ पृष्ठ – 322/ मूल्य – रु.400 

बलिदान चाहिए / रमा द्विवेदी

मेरे देश को भगवान नहीं,सच्चा इंसान चाहिए, गांधी-सुभाष जैसा बलिदान चाहिए। इंसानियत विलख रही इंसान ही के खातिर, इंसाफ दे सके जो ऐसा सत्यवान चाहिए..... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। बचपन यहां पे देखो बन्धुआ बना हुआ है, दिला सके जो इनको मुक्ति ऐसा दयावान चाहिए.... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। मुखौटों के पीछे क्या है कोई जानता नहीं है, दिखा सके जो असली चेहरा ऐसा महान चाहिए.... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। रोज मर रहे हैं यहां कुर्सी के वास्ते, जो देश के लिए जिए-मरे,ऐसा इक नाम चाहिए.... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। सदियों के बाद भी जो इंसां न बन सकी है, समझ सके जो इनको इंसान,ऐसा कद्र्दान चाहिए... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। मेहनत से नाता टूटा सब यूं ही पाना चाहें, गीतोपदेश वाला कोई श्याम चाहिए... मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए। -रमा द्विवेदी

वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो | Vandana

वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो। राग में जब मत्त झूलो तो कभी माँ को न भूलो, अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो। जब हृदय का तार बोले, शृंखला के बंद खोले; हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो। - सोहनलाल द्विवेदी -

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती | Koshish Karne Waalon Ki Kabhi Haar Nahi Hoti

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है। आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है, जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है। मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में। मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो, क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो। जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम, संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम। कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। - हरिवंशराय बच्चन

कौन सिखाता है चिडियों को

कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना? कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना? कौन सिखाता फुर्र से उड़ना दाने चुग-चुग खाना? कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले बनाना? कौन सिखाता है बच्चों का लालन-पालन उनको? माँ का प्यार, दुलार, चौकसी कौन सिखाता उनको? कुदरत का यह खेल, वही हम सबको, सब कुछ देती। किन्तु नहीं बदले में हमसे वह कुछ भी है लेती। हम सब उसके अंश कि जैसे तरू-पशु–पक्षी सारे। हम सब उसके वंशज जैसे सूरज-चांद-सितारे। - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी