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मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी

मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी तू की जाने प्यार मेरा मैं करूं इंतजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी तू की जाने प्यार मेरा मैं करूं इंतजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी मेरे दिल ने चुनलैयाने तेरे दिल दिया राहां तू जो मेरे नाल तू रहता तुरपे मेरीया साहा जीना मेरा होए हुण्ड है तेरा की मैं करां तू कर ऐतबार मेरा मैं करूं इन्तेजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी वे चंगा नहियों कीता बिवा वे चंगा नहियों कीता बिवा दिल मेरा तोड़ के वे बड़ा पछताइयां अखां वे बड़ा पछताइयां अखां नाल तेरे जोड़ के तेनु छड्ड के कित्थे जावां तू मेरा परछांवा तेरे मुखड़े विच ही मैं तान रब नू अपने पावां मेरी दुआ हाय सजदा तेरा करदी सदा तू सुन इक़रार मेरा मैं करूं इंतज़ार तेरा तू दिल तुइयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी

व्यंग्य: आलस्य-भक्त by Babu Gulabrai

अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम ।। 1 प्रिय ठलुआ-वृंद! यद्यपि हमारी सभा समता के पहियों पर चल रही है और देवताओं की भांति हममें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, तथापि आप लोगों ने मुझे इस सभा का पति बनाकर मेरे कुंआरेपन के कलंक को दूर किया है। नृपति और सेनापति होना मेरे स्‍वप्‍न से भी बाहर था। नृपति नहीं तो नारी-पति होना प्रत्‍येक मनुष्‍य की पहुंच के भीतर है, किंतु मुझ-ऐसे आलस्‍य-भक्‍त के लिए विवाह में पाणिग्रहण तक का तो भार सहना गम्‍य था। उसके आगे सात बार अग्नि की परिक्रमा करना जान पर खेलने से कम न था। जान पर खेल कर जान का जंजाल खरीदना मूर्खता ही है - 'अल्‍पस्‍य हेतोर्बहु हातुमिच्‍छन्, विचारमूढ: प्रतिभासि मे त्‍वम्' का कथन मेरे ऊपर लागू हो जाता। 'ब्‍याहा भला कि क्‍वांरा' - वाली समस्‍या ने मुझे अनेक रात्रि निद्रा देवी के आलिंगन से वंचित रखा था, किंतु जब से मुझे सभापतित्‍व का पद प्राप्‍त हुआ है, तब से यह समस्‍या हल हो गई है। आलसी के लिए इतना ही आराम बहुत है। यद्यपि मेरे सभापति होने की योग्‍यता में तो आप लोगों को संदेह करने के लिए कोई स्‍थान नहीं है

नव वर्ष की बहुत-बहुत शुभ-कामनायें

कल की नई सुबह इतनी            सुहानी हो जाए;     आपके दुखों की सारी बातें             पुरानी हो जाएं;       दे जाए इतनी खुशियां             ये नव वर्ष आपको;        कि ख़ुशी भी आपके             मुस्कुराहट की            दीवानी हो जाएं ।.. आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की बहुत-बहुत शुभ-कामनायें

अमीर खुसरो की रचनाएँ - 2

खुसरो दरिया प्रेम का, सो उलटी वा की धार,  जो उबरो सो डूब गया, जो डूबा हुवा पार। अमीर खुसरो की रचनाएँ - 2 छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके प्रेम बटी का मदवा पिलाइके मतवाली कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा अपनी सी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके खुसरो निजाम के बल बल जाए मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

अमीर खुसरो की रचनाएँ - 1

जो पिया आवन कह गए अजहुँ न आए, अजहुँ न आए स्वामी हो ऐ जो पिया आवन कह गए अजुहँ न आए। अजहुँ न आए स्वामी हो। स्वामी हो, स्वामी हो। आवन कह गए, आए न बाहर मास। जो पिया आवन कह गए अजहुँ न आए। अजहुँ न आए। आवन कह गए। आवन कह गए। ------ अमीर खुसरो 

अग्निरेखा (टकरायेगा नहीं)

टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से, कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ? अब तक धरती अचल रही पैरों के नीचे, फूलों की दे ओट सुरभि के घेरे खींचे, पर पहुँचेगा पथी दूसरे तट पर उस दिन जब चरणों के नीचे सागर लहरायेगा ! कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ? गर्त शिखर वन, उठे लिए भंवरों का मेला, हुए पिघल ज्योतिष्क तिमिर की निश्चल वेला, तू मोती के द्वीप स्वप्न में रहा खोजता, तब तो बहता समय शिला सा जम जायेगा । कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ? तेरी लौ से दीप्त देव-प्रतिमा की आँखें, किरणें बनी पुजारी के हित वर की पांखें, वज्र-शिला पर गढ़ी ध्वंस की रेखायें क्या यह अंगारक हास नहीं पिघला पायेगा ? कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ? धूल पोंछ कांटे मत गिन छाले मत सहला, मत ठण्डे संकल्प आँसुयों से तू नहला, तुझसे हो यदि अग्नि-स्नात यह प्रलय महोत्सव तभी मरण का स्वस्ति-गान जीवन गायेगा । कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ? टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से कौन ज्वार फिर तुझे दिवस तक पहुँचायेगा ? ------------- अग्निरेखा  महादेवी वर्मा

आज का विचार

हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।  - मैथिलीशरण गुप्त।