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Jab Jab ye saavan aaya ......

जब जब ये सावन आया है। अँखियाँ छम छम सी बरस गई। तेरी यादों की बदली से। मेरी ऋतुएँ भी थम सी गई । घनघोर घटा सी याद तेरी । जो छाते ही अकुला सी गई । पपिहे सा व्याकुल मन मेरा। और बंजर धरती सी आस मेरी। कोई और ही हैं... जो मदमाते हैं। सावन में 'रस' से, भर जाते हैं । मैं तुमसे कहाँ कभी रीती हूँ । एक पल में सदियाँ जीती हूँ। मन आज भी मेरा तरसा है। बस नयन मेघ ही बरसा है।। मन आज भी मेरा तरसा है। बस नयन मेघ ही बरसा है।। डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

हिंदी पखवाड़ा

टूटे धागों को  फिर से जोड़ते हैं  चलो....  खामोशी तोड़ते हैं!!! वसुंधरा व्यास की इन पंक्तियों के साथ आप सभी आमंत्रित है, अपने आप को अभियक्त करने केलिए ....   अपनी अभिव्यक्ति -- अपनी ही भाषा में ....   भाषा का प्रयोग ही भाषा  जीवन  है. हिंदी में बोलना शान है , आगे बढे और हिंदी में बोलना शुरू कीजिये।  कितनी ही भाषाएँ आती हों मुझे, पर जो मजा हिंदी में सुनाने सुनाने में आता है, वो कहीं और नहीं।    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में :- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। इसमें कवि मातृभाषा का उपयोग सभी प्रकार की शिक्षा के लिए करने पर जोर देते हैं।   निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।  मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण सम्भव नहीं है। विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,  सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये।

प्रेम की कविता

वह मेरी खिड़की के सामने धीरे से बोली-- ‘म्याऊँ’ मैं उस समय सोया हुआ था मुझे लगा मेरी नींद में आ गई है कोई बिल्ली उसकी लम्बी छलांग से टूट गयी मेरी नींद बाहर गया जब मैं उसका पीछा करता हुआ तो देखा मेरी पत्नी थी मुझे देख मुस्कराती हुई फिर वह बरसने लगी मेघ की तरह मेरे कमरे में मैं पहली बार भीगा था कोई सपना जो देखा था वर्षों पहले जैसे वह सच हुआ था मैंने उसे कई बार छुआ था पर आज जो कुछ मेरे मन में हुआ वह कभी नहीं हुआ था ----  विमल कुमार

नज़्म : वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत

वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत थे जो इश्‍क को काम समझते थे या काम से आशिकी रखते थे हम जीते जी नाकाम रहे ना इश्‍क किया ना काम किया काम इश्‍क में आड़े आता रहा और इश्‍क से काम उलझता रहा फिर आखिर तंग आकर हमने दोनों को अधूरा छोड़ दिया शायर: फैज अहमद फैज

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी में 9 सितम्बर, 1850 को हुआ था। इनके पिता श्री गोपालचन्द्र अग्रवाल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और‘गिरिधर दास’ उपनाम से भक्ति रचनाएँ लिखते थे। घर के काव्यमय वातावरण का प्रभाव भारतेन्दु जी पर पड़ा और पाँच वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना पहला दोहा लिखा। उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया- लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान।  बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥ उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० में उन्हें 'भारतेंदु'(भारत का चंद्रमा) की उपाधि प्रदान की। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं क

प्रकाश फ़िक्री

प्रकाश फ़िक्री (1930-2008, रांची, भारत) (ज़हीरुल हक़) आधुनिक उर्दू शायर किताबें: सफ़र सितारा और एक ज़रा सी बारिश आँधियाँ आती हैं और पेड़ गिरा करते हैं आँख पत्थर की तरह अक्स से ख़ाली होगी अजीब रुत है दरख़्तों को बे-ज़बाँ देखूँ चाँदी जैसी झिलमिल मछली पानी पिघले नीलम सा दुश्मनी की इस हवा को तेज़ होना चाहिए एहसास-ए-ज़ियाँ चैन से सोने नहीं देता हवा से उजड़ कर बिखर क्यूँ गए हवा से ज़र्द पत्ते गिर रहे हैं जिस का बदन गुलाब था वो यार भी नहीं कहाँ कहाँ से गुज़र रहा हूँ काली रातों में फ़सील-ए-दर्द ऊँची हो गई ख़ुनुक हवा का ये झोंका शरार कैसे हुआ किसी का नक़्श अंधेरे में जब उभर आया मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था पहाड़ों से उतरती शाम की बेचारगी देखें रफ़्ता रफ़्ता सब मनाज़िर खो गए अच्छा हुआ रंगीन ख़्वाब आस के नक़्शे जला भी दे साथ दरिया के हम भी जाएँ क्या शबनम भीगी घास पे चलना कितना अच्छा लगता है तेरी सदा की आस में इक शख़्स रोएगा वो राब्ते भी अनोखे जो दूरियाँ बरतें ज़र्द पेड़ों पे शाम है गिर्यां

समय का सदुपयोग | Samay Ka Sadupayog

समय का सदुपयोग:  पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित इस पुस्तक को हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए .  यदि हमें जीवन से प्रेम है तो यही उचित है कि समय को व्यर्थनष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ ही चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा था- मैंने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।  खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है । भूली हुई विद्या फिरयाद की जा सकती है । खोया स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जासकता है, पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता,उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है ।  जिस प्रकार धन के बदले में अभीष्ठित वस्तुएँ खरीदी जास कती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मीकीर्ति आरोग्य, सुख-शांति, आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है । ईश्वर समय रूपी प्रचुर धन देकर मनुष्यको पृथ्वी पर भेजा है और निर्देश दिया है कि इसके बदले में ससारकी जो वस्तु रुचिकर समझें खरीद लें । कितने व्यक्ति है जो समय का मूल्य समझते और उसका सदुपयोग करते है ? अधिकांश लोग आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद