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संदेश

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

मातृ-भाषा के प्रति निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन। पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।। उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय। निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।। निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय। लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।। इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग। तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।। और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात। निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।। तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय। यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात। विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।। सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय। उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।। - भारतेंदु हरिश्चंद्र

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

 ~~~~ प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर! प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर! दुख से आविल सुख से पंकिल, बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल, बहता है युग-युग अधीर! जीवन-पथ का दुर्गमतम तल अपनी गति से कर सजल सरल, शीतल करता युग तृषित तीर! इसमें उपजा यह नीरज सित, कोमल कोमल लज्जित मीलित; सौरभ सी लेकर मधुर पीर! इसमें न पंक का चिन्ह शेष, इसमें न ठहरता सलिल-लेश, इसको न जगाती मधुप-भीर! तेरे करुणा-कण से विलसित, हो तेरी चितवन में विकसित, छू तेरी श्वासों का समीर! ---- महादेवी वर्मा

Jab Jab ye saavan aaya ......

जब जब ये सावन आया है। अँखियाँ छम छम सी बरस गई। तेरी यादों की बदली से। मेरी ऋतुएँ भी थम सी गई । घनघोर घटा सी याद तेरी । जो छाते ही अकुला सी गई । पपिहे सा व्याकुल मन मेरा। और बंजर धरती सी आस मेरी। कोई और ही हैं... जो मदमाते हैं। सावन में 'रस' से, भर जाते हैं । मैं तुमसे कहाँ कभी रीती हूँ । एक पल में सदियाँ जीती हूँ। मन आज भी मेरा तरसा है। बस नयन मेघ ही बरसा है।। मन आज भी मेरा तरसा है। बस नयन मेघ ही बरसा है।। डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी 

हिंदी पखवाड़ा

टूटे धागों को  फिर से जोड़ते हैं  चलो....  खामोशी तोड़ते हैं!!! वसुंधरा व्यास की इन पंक्तियों के साथ आप सभी आमंत्रित है, अपने आप को अभियक्त करने केलिए ....   अपनी अभिव्यक्ति -- अपनी ही भाषा में ....   भाषा का प्रयोग ही भाषा  जीवन  है. हिंदी में बोलना शान है , आगे बढे और हिंदी में बोलना शुरू कीजिये।  कितनी ही भाषाएँ आती हों मुझे, पर जो मजा हिंदी में सुनाने सुनाने में आता है, वो कहीं और नहीं।    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में :- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। इसमें कवि मातृभाषा का उपयोग सभी प्रकार की शिक्षा के लिए करने पर जोर देते हैं।   निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।  मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण सम्भव नहीं है। विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,  सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये।

प्रेम की कविता

वह मेरी खिड़की के सामने धीरे से बोली-- ‘म्याऊँ’ मैं उस समय सोया हुआ था मुझे लगा मेरी नींद में आ गई है कोई बिल्ली उसकी लम्बी छलांग से टूट गयी मेरी नींद बाहर गया जब मैं उसका पीछा करता हुआ तो देखा मेरी पत्नी थी मुझे देख मुस्कराती हुई फिर वह बरसने लगी मेघ की तरह मेरे कमरे में मैं पहली बार भीगा था कोई सपना जो देखा था वर्षों पहले जैसे वह सच हुआ था मैंने उसे कई बार छुआ था पर आज जो कुछ मेरे मन में हुआ वह कभी नहीं हुआ था ----  विमल कुमार

नज़्म : वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत

वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत थे जो इश्‍क को काम समझते थे या काम से आशिकी रखते थे हम जीते जी नाकाम रहे ना इश्‍क किया ना काम किया काम इश्‍क में आड़े आता रहा और इश्‍क से काम उलझता रहा फिर आखिर तंग आकर हमने दोनों को अधूरा छोड़ दिया शायर: फैज अहमद फैज

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी में 9 सितम्बर, 1850 को हुआ था। इनके पिता श्री गोपालचन्द्र अग्रवाल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और‘गिरिधर दास’ उपनाम से भक्ति रचनाएँ लिखते थे। घर के काव्यमय वातावरण का प्रभाव भारतेन्दु जी पर पड़ा और पाँच वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना पहला दोहा लिखा। उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया- लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान।  बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥ उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० में उन्हें 'भारतेंदु'(भारत का चंद्रमा) की उपाधि प्रदान की। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं क