Mulla Nasruddin | मुल्ला नसरुद्दीन


मुल्ला नसरुद्दीन होजा तुर्की (और संभवतः सभी इस्लामी देशों का) सबसे प्रसिद्द विनोद चरित्र है। तुर्की भाषा में होजा शब्द का अर्थ है शिक्षक या स्कॉलर। उसकी चतुराई और वाकपटुता के किस्से संभवतः किसी वास्तविक इमाम पर आधारित हैं। कहा जाता है की उसका जन्म वर्ष १२०८ में तुर्की के होरतो नामक एक गाँव में हुआ था और वर्ष १२३७ में वह अक्सेहिर नामक मध्यकालीन नगर में बस गया जहाँ हिजरी वर्ष ६८३ (ईसवी १२८५) में उसकी मृत्यु हो गई। मुल्ला नसरुद्दीन के इर्दगिर्द लगभग ३५० कथाएँ और प्रसंग घुमते हैं जिनमें से बहुतों की सत्यता संदिग्ध है।


मुल्ला नसरूदीन कहानियों की दुनिया का एक ऐसा पात्र था, जो सूदखोरों, जबरन कर वसूल करने वालों तथा दुष्ट दरबारियों का कट्टर दुश्मन था | वह एक नेकदिल इंसान था, जो जुल्म करने वालों को अपनी बुद्धिमानी से ऐसा सबक सिखाता था की वे जिंदगी-भर नहीं भूलते थे | गरीब लागों के हक़ की लड़ाई लड़ने को वह हमेशा तैयार रहता था | दस वर्षों तक तेहरान, बगदाद और दूसरों शहरों में भटकने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन जब अपने मुल्क बुखारा लौटा तो वह फैली अव्यवस्था के कारन जालिमों से बदला लेने के लिए मैदान में कूद पड़ा | उसका एकमात्र साथी उसका गधा था | उसने निर्धन, अनाथ लोगों को आश्रय दिया तथा अमीरों, सरदारों आदि से अपने बुद्धिबल से दौलत लूटकर गरीबों में बांटी | मुल्ला नासुद्दीन का जिक्र आते ही मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती हैं, जो अपने गधे को साथ लिए यहाँ-वहां घूमता रहता हैं और मसखरेपन से भरपूर हरकते करता रहता हैं, किन्तु इन हरकतों की गहराई में जाने पर भेद खुलता हैं की उसने हंसी-ही-हंसी में कितना बड़ा कारनामा कर डाला हैं |
मुल्ला नसरुद्दीन! बुखारा का मनमौजी-फक्कड इंसान, यातीमों और गरीबों का सहारा, सूदखोरों और जबरन टैक्स वसूल करने वालों का कट्टर दुश्मन….. और बुखारा के अमीर की आखों में चुभने वाला कांटा था.


-1-
सूरज का गोला पश्चिम की पहाडियों के पीछे छिप गया था. सूरज छिपने के बाद मशरिक, मगरिब, सुमाल और जुनूब में फैली सुर्खी भी धीरे-धीरे सिमटने लगी थी. फिजा में ऊंटों के गले में बंधी घंटी की घनघनाहट गूंज रही थी.

एक काफिला बडी तेजी के साथ बुखारा शहर की तरफ बढा जा रहा था. काफिले में सबसे पीछे एक गधे पर सवार जो शख्स था, वह गर्दों-गुब्बार में इस तरह लथपथ हो चुका था कि उसके तमाम बदन पर गर्द की एक मोटी तह जम चुकी थी जिससे उसका चेहरा तक पहचान में न आता था.

दीन-हीन हालत में काफिले के पीछे गधे पर सवार चला आ रहा यह शख्स कोई और नहीं, Mulla Nasruddin था, मुल्ला नसरुद्दीन! अपने वफादार गधे के साथ शहर दर शहर खाक छानते हुए वह दस बरस से अपने मादरे-वतन बुखारा से दूर रहा था, लेकिन उसकी आखों में हमेशा अपने वतन के मासूम लोगों की चीखों-पुकार, अमीर-उमरावों केे जुल्म कौंधते रहते थे. दस वर्षों में वह बगदाद, इस्तांबुल, बख्शी सराय, तेहरान तिफलिस, अखमेज और दमिष्क जैसे सभी मुल्कों में घुम आया था.

वह जहां भी जाता, गरीबों का मुहाफिज और जुल्म करने वाले अमीर-उमरावों का दुश्मन बन जाता. वह गरीबों और यातीमों के दिलों में कभी न भुलाई जाने वाली यादें और जुल्म के पैरोकारों के दिलों में खौफ के साए छोड जाता.

अब वह अपने प्यारे वतन बुखारा लौट रहा था, ताकि बरसों से भटकती अपनी जिंदगी को वह कुछ चैन-सुकुन भरे ठहराव के पल दे सके. काफिले के पीछे चल रहा मुल्ला नसरुद्दीन हालांकि गर्दों-बुब्बार में पूरी तरह लथपथ हो चुका था मगर फिर भी वह खुष था.

इस धूल-मिट्टी से उसे सोंधी-सोंधी खुशबु आती महसूस हो रही थी, आखिर यह मिट्टी उसके अपने प्यारे वतन बुखारा की जो थी. काफिला जिस वक्त शहर की चारदीवारी के करीब पहुंचा, फाटक पर तैनात पहरेदार फाटक बंद कर रहे थे.

काफिले से सरदार ने दूर से ही मोहरों से भरी थैली ऊपर उठाते हुए चिल्लाकर पहरेदारों से कहा- खुदा के वास्ते रुकों, हमारा इंतजार करो.

हवा की सांय-सांय और घंटियों की घनघनाहट में पहरेदार उनकी आवाज न सुन सके और फासला होने के कारण उन्हें मोहरों से भरी थैली भी दिखाई न दी.

फाटक बंद कर दिए गए- अंदर से मोटी-मोटी सांकलें लगा दी गई और पहरेदार बुर्जियों पर चढकर तोपों पर तैनात हो गए. धीरे-धीरे अंधेरा फैलना शुरू हो गया था. हवा में तेजी के साथ-साथ कुछ ठंडक भी बढने लगी थी.

आसमान पर सितारों की टिमटिमाहट के बीच दूज का चांद चमकने लगा था. सरदार ने काफिले को वहीं चार दीवारी के पास ही डेरा डालने का हुक्म दे दिया. बुखारा शहर की मस्जिदों की ऊंची-ऊंची मीनारो से झुटपुटे की उस ख़ामोशी में अजान की तेज-तेज आवाजें आने लगीे.

अजान की आवाज सुनकर काफिले के सभी लोग नमाज के लिए इकठ्ठा होने लगे मगर मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे के साथ एक ओर को खिसक लिया.

वह अपने गधे के साथ चलते हूए कहने लगा – ऐं मेरे प्यारे गधे! काफिले के इन लोगों को तो खुदा ने सब कुछ अदा किया है जिसके लिए ये व्यापारी नमाज पढकर खुदा का शुक्रिया अदा करें.

ये लोग शाम का खाना खा चुके हैं और अभी थोडी देर बाद रात का खाना खाएंगें. मेरे वफादार गधे! मैं और तू तो अभी भूखे है.

हमें न तो शाम का खाना मिला हैं और न ही अब रात को मिलेगा. शुक्रिया चाहता हैं तो मेरे लिए पुलाव की तष्तरी और तेरे लिए एक गट्ठर तिपतियां वाला घांस भिजवा दे.

काफिले से काफी दूर आकर उसने अपने गधे को पगडंडी के किनारे एक पेड से बांध दिया और पास ही एक पत्थर अपने सिरहाने रखकर नंगी जमीन पर लेट गया. ऊपर टिमटिमाते सितारों का जाल सा बुना हुआ थां.

पिछले दस सालों से अक्सर इन सितारों को देखते-देखते उसकी अच्छी खासी जान-पहचान हो गई थी.

अक्सर वह इन सितारों को निहारता रहता था. कभी बगदाद से, कभी इंस्ताबुल से, कभी दमिष्क से तो कभी तेहरान से. तमाम शहरों से उसे आसमान और आसमान पर टिमटिमाते हुए सितारे एक ही जैसे लगते थे.

वही गहरा औश्र खामोश-सा आसमान और वही टिम-टिम करते जाने-पहचाने सितारे. दुनिया-भर के शहरों में सरहद ने आकर जो गहरी-गहरी अपने-पराए की खाई खोदी हुई हैं, ऐसा कुछ भी आसमान और उसके सितारों के दरम्यां उसने कभी महसूस न किया था.

उसे हमेशा यही लगता कि रातों की शांत व पवित्र दुआओं की आवाजे उसे बडे धनवानों से भी धनवान बना देती थी और आखिर वह खुद को धनवान महसूस करे भी क्यों नहीे. उसे वह सब कुछ हासिल था, जो दुनिया के बडे-बडे रईसों को भी हासिल न था.

इस दुनिया में हर आदमी का अपना-अपना नसीब होता है. भले ही अमीर लोग सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खाऐं, लेकिन वे अपनी सभी रातें छत के नीचे गुजारने को ही मजबुर हैं.

इस तरह (मुल्ला नसरुद्दीन की तरह) सर्द और सितारों भरे आसमान को निहारते हुए और कल्पना की उडान भरते हुए अमीर लोग कभी भी सोचने का मौंका नहीं जुटा सकते-ऐसा उन बेचारों का नसीब कहां, जो उन्हें इस तरह की सहूलियत मिल सकें.

एकजुट होकर नमाज अदा करते लोग अपनी इबादत पूरी करके अपने-अपने खेमों में भोजन की व्यवस्था में जुट गए. चारदीवारी के बाहर बडे-बडे कहाडों के नीचे आग जलने लगी.

जिबह के लिए तैयार भेडें और बकरीयां बुरी तरह मिमियां उठी. कहाडों के नीचे जलती आग ने भुनते हुए मसालों की गंध हवा में बिखेर दी. मुल्ला नसरुद्दीन हवा के रूख को पहचानकर, उस जगह पर जा लेटा, जहां पर यह भूख जगाने वाली खाने की गंध न पहुंच सके.

तारों को निहारता हुआ वह सोच रहा था कि कल जब वह बुखारा शहर में वह प्रवेश करेगा तो उसे फाटक पर ही चूंगी अदा करनी होगीं हालांकि उसे बुखारा छोडे दस बरस बीत चुके थे मगर अभी तक उसे बुखारा के सभी रिवाजों की पुरी जानकारी थी.

उसने यही सोचकर अपनी रकम का आखिरी हिस्सा बचाकर रख छोडा था. वह दुनिया के भले ही किसी भी मुल्क में रहा हो, उसे अपने बुखारा की और बुखारा के रीति-रिवाजों की हमेशा याद आती रहती थी. लेटा-लेटा वह अपने प्यारे वतन की याद में खो गया.

उसे अपने वतन से बेहद प्यार था. धूप से तपे तांबई चेहरे पर काली दाढी और साफ आंखों वाला खुषमिजाज मुल्ला नसरुद्दीन तेल की चिकनाई से सनी पगडी, पैंबंद लगे कोट और फटे जूतें पहने अपने वतन से जितनी दूर होता, वतन के लिए उसके दिल में उतना ही प्यार उमडता.

उसे अपने बुखारा की ऊंची-ऊंची मिनारें, चरागाह, खेत, गांव और रेगिस्तान खूब याद आते थें। उसे पता चल चुका था कि पुराना अमीर गारत हो चुका है, लेकिन उसके बाद बना नया उससे भी काईयां और संगदिल था।

इस नए अमीर ने पहले अमीर से भी ज्यादा आवाम पर जुल्मों-सितम ढा रखे थे. आवाम को तरह-तरह की चुंगी लगाकर लुटा जा रहा था. वैसे नया अमीर बडा ही धार्मिक था.

वह साल में दो बार शेख बहाउद्दीन की पवित्र दरगाह पर सजदा करने जाता था, जो बुखारा शहर के पास ही थी. लुट-खसोट पुरे जोरों पर थी. खेत-खलिहान सुखकर जल चुके थे. धरती में दारारें पड गई थी. दस्तकारियां समाप्त हो चुकी थी और व्यापार लगातार घटता जा रहा था.

मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचते-सोचते एक गहरी सांस ली और करवट बदलकर फिर अपनी सोचों में गुम हो गया. सुबह की अजान के साथ ही पूरा कारवां उठ गया. ऊँट वालों ने सामान ऊंटों पर लादना शुरू कर दिया. सौदागर अपनी पगडियां दुरुस्त करने लगे.

नसरुद्दीन भी उठा, सबसे पहले अपनी अंटी में खुंसी थैली टटोली, वह सलामत थी, फिर अपने गधे के करीब आकर उसकी पीठ पर हाथ फेरा- ऐ मेरे वफादार गधे! चल, अपने मुल्क में दाखिल होने का मुबारक वक्त आ गया है.

ऊंटों के गले की घंटियां बज उठी और कारवां फाटक की ओर बढ गया. फाटक में दाखिल होते ही सब एक ओर रुक गए. पुरी सडक पहरेदारों ने घेरी हुई थी.

सिपाहियों की तादाद भी काफी थी। कुछ तो कायदे से वर्दियां पहने थे, मगर कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें वर्दी पहनने का सलीका तक न था. अमीर की नौकरी में अभी वे नए थे और उन्हें रिशवत खोरी का पूरा मौका नहीं मिला था.

वे चीख-चिल्ला रहे थे, उस लूट के लिए लडाई-झगडा और धक्का-मुक्की कर रहे थे, जो उन्हें व्यापारियों से हासिल होने वाली थी. फाटक के करीब ही एक चाय की दुकान थी.

वर्दी पहने अफसर-सा दिखाई देने वाला एक तुंदियल व्यक्ति बाहर आया. उसके पैरां मे जूतियां थी. उसके मोटे और थुलथुले चेहरे पर अय्याशी, बदकारी और जलालत के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे.

उसने एक ललचाई नजर से व्यापारियों की ओर देखा, फिर बोला- हे सौदागरों! बुखारा में तुम्हारा स्वागत है. खुदा करें तुम्हे अपने काम में…..अपने इरादों में कामयाबी हासिल हो. ऐ व्यापारियों!

आपको यह इल्म होना चाहिए कि अमीर का हुक्म हैं कि जो सौदागर अपने माल का मामूली-सा हिस्सा भी छिपाने की कोशिश करेगा, उसे बेंत लगा-लगाकर मार डाला जाएगा.

यह सुनकर व्यापारी कुछ विचलित हुए और परेशानी की हालत में रंगी दाढियां सहलाने लगे. कर अधिकारी बडी मशक्कत के बाद पहरेदारों की ओर पलटकर बोला – ऐं बुखारा के वफादारों! अपना काम शुरू करो.

आदेश पाते ही सिपाही चीखते-चिल्लाते ऊंटों पर झपट पडे. वे खुषी से चीख-चिल्ला रहे थे, जैसे किसी लूट में शरीक हो रहे हो. और अधिक से अधिक माल एक-दूसरे से पहले लूट लेना चाहते हों.

सन के मोटे-मोटे रस्से उन्होंने अपनी तलवारों से काट डाले और देखते ही देखते सामान की गाठें खोल डाली. सडक पर कीमती सामान बिखरा दिखाई देने लगा, इसमें कीमती कपडों के थान, चाय, काली मिर्च, कपूर, गुलाब के इत्र की शीशियां तथा तिब्बती औषधियों के डिब्बे थे.

व्यापारी बेबस से खडे सिपाहियों की लूट-खसोट करते देख रहे थे. जिसके मन में जो आ रहा था, वह एक-दूसरे की नजर बचाकर अपनी जेब के हवाले कर रहा था. केवल दो घडी……।

यह सिलसिला केवल दो घडी चला, फिर सभी सिपाही कर अधिकारी के पीछे जाकर खडे हो गए. लूट के माल से भरी उनकी जेबें फटी जा रही थी. फिर शुरू हुई शहर मे आने और सामान लाने की वसूली.

गधा और गधे के रिश्तेदार बुखारा में दाखिल होते समय व्यापार के लिए मुल्ला नसरुद्दीन के पास कोई सामान न था उसे तो सिर्फ शहर में दाखिल होने का Tax अदा करना था.

अधिकारी ने पुछा – तुम कहाँ से आए हो और आने का सबब क्या है ? मुहर्रिर ने सींग से भरी स्याही में नेजे की कलम डुबोई और मुल्ला नसरुद्दीन का बयान दर्ज करने के लिए तैयार हो गया।

मुल्ला नसरुद्दीन ने बताया – हुजूरे आला! मैं ईरान से आया हूं. बुखारा मेरे कुछ संबंधी रहते हेैं, उन्हीं से मिलने आया हूं. यह सुनकर अधिकारी ने कहा – अच्छा तो तुम अपने संबंधियों से मिलने आए हो, तुम्हें मिलने वालों का कर अदा करना पडेंगा.

लेकिन हुजूर! मैं उनसे मिलूंगा नहीं. मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा – मैं तो एक जरुरी काम से आया हूं. काम से आए हो ? अधिकारी चीखा, उसकी आखों में चमक उभर आई – इसका मतलब हैं कि तुम अपने रिश्तेदारो से भी मिलोगे और काम भी निबटाओेगे.

तुम्हे दोनों कर अदा करने पडेंगे, मिलने वालों का भी और काम का भी. इसके अलावा उस अल्लाह के सम्मान में मस्जिदों की आराइश के लिए अतिया अदा करों जिस अल्लाह ने रास्ते में डकैतों से तुम्हारी हिफाजत की.

मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचा – मैं चाहता था कि वह अल्लाह इस समय मेरी इन मुफ्तखोरों से हिफाजत करता, डकैतों से बचाव तो मैं खुद कर लेता, लेकिन वह खामोष ही रहा क्योंकि उसे मालूम था कि इस बातचीत के प्रत्येक शब्द का मूल्य उसे दस तंके देकर चुकाना पडेगा.

उसने चुपचाप अपनी अंटी में से थैली निकालकर शहर में दाखिले का, रिष्तेदारो का, व्यापार का तथा मस्जिदों का कर अदा किया. सिपाही इस फिराक में आगे को झुक-झुककर देख रहे थे कि देखें इसके पास कितनी रकम है, मगर जब कर अधिकारी ने उन्हें सख्त निगाह से घूरा तो वे पीछे हट गए.

मुहर्रिर कीे नेजे की कलम तेजी से रजिस्टर पर चल रही थी।

कर अदा करने के बाद भी नसरुदीन की थैली में कुछ तंके बच गए थे। कर अधिकारी की आखों में वे तंके खटक रहे थे और वह तेजी से सोच रहा था कि वह तंके भी इससे कैसे हथियाए जाऐ ?

कर अदा करने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन चलने को हुआ तो अधिकारी चिल्लाया – ठहरों! मुल्ला नसरुद्दीन पलटकर उसका चेहरा देखने लगा. इस गधे का कर कौन अदा करेगा ?

यदि तुम अपने रिष्तेदारों से मिलने आए हो तो जाहिर हैं कि तुम्हारा गधा भी अपने रिष्तेदारों से मिलेगा, इसका कर अदा करो.

मुल्ला नसरुद्दीन ने फिर अपनी थैली का मूह खोला और बडी ही नम्रता से बोला – मेरे आका! आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया है. हकीकत में बुखारा में मेरे गधे के संबधियों की तादाद बहुत ज्यादा है, वरना जैसे यहां काम चल रहा हैं, उसे देखते हुए तो तुम्हारे अमीर बहुत पहले की तख्त से उतार दिए गए होते और मेरे हुजूर! आप अपने लालच की वजह से न जाने कब के सूली पर चढा दिए गए होते. इससे पहले कि कर अधिकारी उसकी बात का अर्थ समझ पाता, मुल्ला नसरुद्दीन उछलकर अपने गधे पर बैठा और उसे ऐड लगाकर सरपट दौडाता हुआ एक गली में जा घुसा.

वह लगातार अपने गधे का हौसला बढाते हुए कह रहा था-और तेज-और तेज मेरे वफादार दोस्त! जल्दी भाग वरना तेरे इस मालिक को एक और कर अपना ये सिर देकर चुकाना होगा-और तेज मेरे वफादार गधे, और तेज….। मुल्ला नसरुद्दीन का गधा भी अलग किस्म का था.

मालिक ना भी कहे तब भी वह हालात को देखकर अपनी चाल बदल लेता था, उसके लंबे और सतर्क कानों ने फटाक से आती चिल्लपों और कर अधिकारी की डकराहट सुन ली थी जो अपने सिपाहीयों उस शैतान को पकड लाने का आदेश दे रहा था.

जाओ जल्दी जाओ पकड कर लाओ उस काफिर को आखिर वह हौन है? हवा में तेरती इन आवाजों ने मुल्ला नसरुद्दीन के पैरों मे जेैसे बिजली भर दी हो वह किसी की भी परवाह किए बिना भागे जा रहा था.

वह इतनी तेजी से भाग रहा था कि मुल्ला नसरुद्दीन को भी अपने पांव उपर उठाने पड रहे थे. वह तो बिलकुल गधे की पीठ पर पडी जीन से चिपक गया था. उसकी बाजुऐं गधे की गर्दन से लिपटी हुई थी.

यह देखकर गली के कुत्ते डर और घबराहट के मारे भोंकने लगे कि या अल्लाह यह क्या बवाल आ गया? गली में घुमते घूमते मुर्गे-मुर्गीयां और उनके चुजें डर कर इधर-उधर भाग रहे थे. राहगीर अचरज से दिवारों के साथ सटकर खडे हो गये थै.

कौई समझ नही पा रहा था कि क्या मुसीबत है ? किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. उधर कुछ सिपाही उसकी खोज में इधर-उधर निकल पडे थे. कर अधिकारी अभी तक क्रोध से थर-थरा रहा था. उसकी आखें लाल हो गई थी. और नथूने फडफडा रहे थे.

एक फांस की तरह उसके फलक मे फंसी हुई थी कि वह आजाद खयालात वाला निडर आदमी कहीं मुल्ला नसरुद्दीन तो नहीं था ? उधर लोग भी आपस में खुसफुसर करने लगे थे.

ये जवाब तो मुल्ला नसरुद्दीन के ही योग्य था दोपहर होते होते यह चर्चा पुरे शहर में पहूंच चुकी थी कि एक व्यक्ति ने द्वार पर एसी बात कही. जिसने भी सुना उसने यही कहा- ऐसा जवाब तो मुल्ला नसरुद्दीन ही दे सकता है.

मूल्ला के खयालिक पूलाव

एक बार अपने गधे पर सवार  मुल्ला नसरुद्दीन कहीं चला जा रहा था। कहाँ जा रहा था यह उसे खुद पता नहीं था। वह गधे की पीठ पर बैठा खयालिक पूलाव पका रहा था।

मैं चार दुकाने खरीदुंगा एक कुम्हार की, एक जीन साज की, एक दर्जी की, एक मोची की। हर दुकान में दो कारीगर रखुंगा- बस ! अपना काम तो सिर्फ पैसा बटोरना- बस फिर साल-दो-साल में रईस बन जाऊंगा – मकान ? हाँ मकान भी तो खरीदूंगा।

आह! डसमे एक बाग भी होगा। बाग में फव्वारे होंगे, पेड होंगे, पौधे होंगे, पेडों पर पिंजरें लटके होंगे, जिनमे चिडियां चह-चहा रही होंगी- शादी ? अरे हाँ भाई शादी भी करूंगा। ज्यादा नहीं बस दो शादीयां करूगा। हर बीवी से तीन या चार बार लडके हों
गे। वाह मजा आ जायेगा। फिर उनकी शादीयां………

अपने ही विचारों में गुम मुल्ला नसरुद्दीन को दिन में दिन-दुनिया की कोई खबर ही नहीं थी, उसका गधा किस ओर जा रहा था, इसका भी उसे कोई ईल्म नहीं था। वह तो बस अपने खयालों की दुनिया में खोया हुआ था। उसका गधा भी मालिक को लापरवाह जानकर अपनी बदकारी पर उतर आया था। सामने ही एक छोटी सी खाई पर पूल बना था
मगर वह शैतान पूल पर न जाकर दाईं ओर मुड गया। उसका ईरादा छलांग लगाकर खायी पार करने का था। और ऐसा ही उसने किया भी। उसने अपनी चाल और तेज की और दोडकर छलांग लगा दी।
उधर मूल्ला नसरूद्दीन अपने लडकों के खयालों में उलझा हुआ था। जब लडके बडे हो जायेंगे तो मैं उन्हें बुलाकर …..अरे! यह मैं हवा में क्यों उडा जा रहा हूं- या खुदा मेरे शरीर में पंख लग गये क्या? लेकिन  नहीं ऐसा कुछ नहीं था, इसका अहसास उसे तब हुआ जब वह बंदूक की गोली की भांति धरती पर आकर गिरा।

उसके हलख से एक तेज चीख निकल पडी। उसकी आखों के सामने सीतारे से गिरकर रह गये।
जल्द ही उसे वास्तविकता का अहसास हो गया।

और फिर धूल और गर्द से भरा कराहता हुआ जब वह उठा तो उसका गधा दोस्ताना अंदाज में कान हिलाता हुआ उसके करीब आकर खडा हो गया। दुनिया भर की मासुमियत उसके चेहरे पर झलक रही थी। उसने कुछ ऐसे अंदाज में आखें चिमचिमाई मानों अपने मालिक से कहना चाहता हो कि आओ मेरे आका! फिर से मेरी पीठ पर बैठों।
अबे नमक हराम, गुस्ताख मेरे बाप दादाओं के ना मालूम किन गुनाहां की सजा के रूप में तेरा मेरा साथ बना है। या मेरे खुदा! इस लकडबघें।ना जाने मूल्ला नसरूद्दीन उसे कितनी गालियां और देता कि तभी उसकी नजर वहीं एक टुटी हुई दीवार के पास बैठे कुछ लोगो पर पडी और वह खामोष हो गया।
परंपरा
कई लोगों की भीड़ में मुल्ला नसरुद्दीन नमाज़ अदा करने के दौरान आगे झुका. उस दिन उसने कुछ ऊंचा कुरता पहना हुआ था. आगे झुकने पर उसका कुरता ऊपर चढ़ गया और उसकी कमर का निचला हिस्सा झलकने लगा.

मुल्ला के पीछे बैठे आदमी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने मुल्ला के कुरते को थोड़ा नीचे खींच दिया.

मुल्ला ने फ़ौरन अपने आगे बैठे आदमी का कुरता नीचे खींच दिया.

आगेवाले आदमी ने पलटकर मुल्ला से हैरत से पूछा – “ये क्या करते हो मुल्ला?”

“मुझसे नहीं, पीछेवालों से पूछो” – मुल्ला ने कहा – “शुरुआत वहां से हुई है”.

मुल्ला नसरुद्दीन का भाषण

एक बार शहर के लोगों ने मुल्ला नसरुद्दीन को किसी विषय पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया. मुल्ला जब बोलने के लिए मंच पर गया तो उसने देखा कि वहां उसे सुनने के लिए आये लोग उत्साह में नहीं दिख रहे थे.

मुल्ला ने उनसे पूछा – “क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?”

श्रोताओं ने कहा – “नहीं.”

मुल्ला चिढ़ते हुए बोला – “मैं उन लोगों को कुछ भी नहीं सुनाना चाहता जो ये तक नहीं जानते कि मैं किस विषय पर बात करनेवाला हूँ.” – यह कहकर मुल्ला वहां से चलता बना.

भीड़ में मौजूद लोग यह सुनकर शर्मिंदा हुए और अगले हफ्ते मुल्ला को एक बार और भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने उनसे दुबारा वही सवाल पूछा – “क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?”

लोग इस बार कोई गलती नहीं करना चाहते थे. सबने एक स्वर में कहा – “हाँ.”

मुल्ला फिर से चिढ़कर बोला – “यदि आप लोग इतने ही जानकार हैं तो मैं यहाँ आप सबका और अपना वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहता.” मुल्ला वापस चला गया.

लोगों ने आपस में बातचीत की और मुल्ला को तीसरी बार भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने तीसरी बार उनसे वही सवाल पूछा. भीड़ में मौजूद लोग पहले ही तय कर चुके थे कि वे क्या जवाब देंगे. इस बार आधे लोगों ने ‘हां’ कहा और आधे लोगों ने ‘नहीं’ कहा.

मुल्ला ने उनका जवाब सुनकर कहा – “ऐसा है तो जो लोग जानते हैं वे बाकी लोगों को बता दें कि मैं किस बारे में बात करनेवाला था.” यह कहकर मुल्ला अपने घर चला गया.

खुशबू और खनक
एक दुकान से मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने लिए 2 तथा गधे के लिए 10 नान खरीदे, साथ ही भेड़ का भुना हुआ लज्जतदार गोश्त भी लिया।
दरी में बैठकर नसरुद्दीन खाना खाने लगा। पास ही खड़ा उसका गधा भी नानों पर हाथ साफ करने में जुटा था।
नसरुद्दीन ने उसी स्थान पर रात बिताने की सोच रखी थी। वह खुले में बैठै था तो धनी व्यापारी तथा यात्री तंबू गाड़कर भीतर बैठे मौज कर रहे थे।
तभी नसरुद्दीन के कानों में कुछ तेज-तेज आवाज़ें पड़ी, जैसे कोई झगड़ रहा हो। जिस दुकान से उसने नान तथा गोश्त खरीदा था, वहीं कुछ हलचल सी दिख रही थी।
नसरुद्दीन अपनी उत्सुकता दबा न सका और उसी ओर बढ़ चला।

उसने देखा कि दुकान का मालिक एक गरीब से दिखने वाले आदमी से झगड़ रहा था।
वह कह रहा था, ‘‘तुम्हें पैसे देने ही होंगे। तुम जानबूझ कर उस ओर लेटे थे, जिस ओर मेरी दुकान से गोश्त की खुशबू उठकर जा रही थी। सारी शाम तुम बढ़िया खाने की खुशबू का आनंद लेते रहे। मैंने देखा भी था- तुम बार-बार होंठों पर जीभ फिरा कर चटखारे ले रहे थे। मैं कोई दान-खाता खोलकर नहीं बैठा-जल्दी से पैसे चुकाओ।’’
बेचारा गरीब आदमी बेहद असहाय दिख रहा था। शायद, नसरुद्दीन की तरह उसके पास भी फालतू पैसे नहीं थे।
लालची दुकानदार की बातें सुनकर नसरुद्दीन को गुस्सा आने लगा था।

तभी दुकानदार अचानक नसरुद्दीन की तरफ मुड़ता हुआ बोला, ‘‘भाई साहब, अभी आप एक शरीफ आदमी की तरह मुझसे नान-गोश्त खरीद ले गए थे। लेकिन इस मक्कार को देखो- मुफ्त में स्वाद लेना चाहता है। क्या इसे दाम नहीं चुकाना चाहिए ?’’
नसरुद्दीन उस आदमी से मुखाबित होता बोला, ‘‘भाई, तुमने ललीज खाने की खुशबू का आनंद लिया है, तुम्हें कीमत चुकानी होगी। लाओ, जितने पैसे हैं तुम्हारे पास मुझे दे दो।’’
सुनकर दुकानदार का चेहरा खिल उठा।
गरीब आदमी ने अंटी में से कुछ सिक्के निकालकर नसरुद्दीन की हथेली पर रख दिए।
नसरुद्दीन ने उन सिक्कों को दोनों हथेलियों के बीच रखा और दुकानदार से बोला, ‘‘लाओ, अपना कान इधर लाओ और ध्यान से सुनो।’’
दुकानदार के कुछ समझ में ही नहीं आया।
नसरुद्दीन बोला, ‘‘तुमने सुनी सिक्कों की खनक ?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, लाओ पैसे मुझे दे दो।’’ दुकानदार बोला।
लेकिन नसरुद्दीन ने सिक्के गरीब आदमी को लौटा दिए और दुकानदार से बोला, ‘‘हिसाब बराबर हो गया। इसने तुम्हारे खाने की खुशबू ली और तुमने बदले में सिक्कों की खनक सुन ली।’’
दुकानदार का चेहरा फक्क पड़ गया।
वहां खड़े लोगों ने भी नसरुद्दीन की बात का समर्थन किया।
उस गरीब आदमी ने नसरुद्दीन का शुक्रिया अदा किया।
जब नसरुद्दीन वापस गधे के पास पहुंचा तो वह उसे देख खुशी से मिट्टी में लोटने लगा।

पेशगी थप्पड़

एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ने घर का काम-काज करने के लिए नौकर रखा। उसका मानना था कि तालाब से पानी भरकर लाना उस जैसे इज्जतदार आदमी के लिए अच्छा नहीं।
एक-दो बार ऐसा भी हो चुका था कि पानी लेकर लौटते समय नसरुद्दीन की मुलाकात किसी पहचान वाले से हो जाती। वह आदाब करता तो नसरुद्दीन को भी झुककर जवाब देना पड़ता और नसरुद्दीन के कंधे पर घड़े में रखा सारा पानी सामने वाले पर जा गिरता। किसी से कुछ कहते न बनता था।
उसके नौकर का नाम था अब्दुल।
एक दिन नसरुद्दीन ने उसे मिट्टी का घड़ा देते हुए कहा, ‘‘यह घड़ा लो, तुम्हें रोज 12 घड़े पानी तालाब से भरकर लाना है।’’

अब्दुल ने रजामंदी में सिर हिलाया।
जैसे ही वह जाने को तैयार हुआ कि नसरुद्दीन बोला, ‘‘सुनो ! सावधानी बरतना, घड़ा टूटना नहीं चाहिए।’’
अब्दुल मुड़कर जाने लगा तो नसरुद्दीन फिर बोला, ‘‘चौकस रहना, यदि तुमने घड़ा तोड़ दिया तो थप्पड़ खाना पड़ेगा....याद रखना।’’
अभी अब्दुल दरवाजे तक पहुँचा ही था कि नसरुद्दीन ने चिल्ला कर हाथ से इशारा करते हुए वापस बुलाया।
हैरान-परेशान नौकर वापस नसरुद्दीन के सामने जा खड़ा हुआ।
नसरुद्दीन ने एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया। ‘पटाक्’ की आवाज हुई, अब्दुल के हाथ से घड़ा छूटते-छूटते बचा।

अब्दुल बोला, ‘‘मालिक आपने मुझे मारा क्यों ? मैंने तो घड़ा भी नहीं तोड़ा।’’
नसरुद्दीन बोला, ‘‘देखो भाई, अगर मैं तुम्हें घड़ा टूटने के बाद थप्पड़ मारता तो भी घड़ा जुड़ तो नहीं जाता। जुड़ता क्या ?’’
‘‘नहीं।’’ अब्दुल बोला।
‘‘इसीलिए मैंने तुम्हें पेशगी थप्पड़ मारा है ताकि तुम याद रखो कि घड़ा टूटने पर कैसा थप्पड़ पड़ेगा। तुम भविष्य में चौकस रहोगे।’’
नौकर बेचारा नसरुद्दीन को खुले मुंह ताकता रह गया।
ग़रीब का झोला
एक दिन मुल्ला कहीं जा रहा था कि उसने सड़क पर एक दुखी आदमी को देखा जो ऊपरवाले को अपने खोटे नसीब के लिए कोस रहा था. मुल्ला ने उसके करीब जाकर उससे पूछा – “क्यों भाई, इतने दुखी क्यों हो?”

वह आदमी मुल्ला को अपना फटा-पुराना झोला दिखाते हुए बोला – “इस भरी दुनिया मेरे पास इतना कुछ भी नहीं है जो मेरे इस फटे-पुराने झोले में समा जाये.”

“बहुत बुरी बात है” – मुल्ला बोला और उस आदमी के हाथ से झोला झपटकर सरपट भाग लिया.

अपना एकमात्र माल-असबाब छीन लिए जाने पर वह आदमी रो पड़ा. वह अब पहले से भी ज्यादा दुखी था. अब वह क्या करता! वह अपनी राह चलता रहा.

दूसरी ओर, मुल्ला उसका झोला लेकर भागता हुआ सड़क के एक मोड़ पर आ गया और मोड़ के पीछे उसने वह झोला सड़क के बीचोंबीच रख दिया ताकि उस आदमी को ज़रा दूर चलने पर अपना झोला मिल जाए.

दुखी आदमी ने जब सड़क के मोड़ पर अपना झोला पड़ा पाया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा . वह ख़ुशी से रो पड़ा और उसने झोले को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और बोला – “मेरे झोले, मुझे लगा मैंने तुम्हें सदा के लिए खो दिया!”

झाड़ियों में छुपा मुल्ला यह नज़ारा देख रहा था. वह हंसते हुए खुद से बोला – “ये भी किसी को खुश करने का शानदार तरीका है!”

किस्मत सबकी पलटा खाती है. एक वक़्त ऐसा भी आया कि मुल्ला को खाने के लाले पड़ गए. बहुत सोचने के बाद मुल्ला को लगा कि भीख मांगने से अच्छा पेशा और कोई नहीं हो सकता इसलिए वो शहर के चौक पर खड़ा होकर रोज़ भीख मांगने लगा.

मुल्ला के बेहतर दिनों में उससे जलनेवालों ने जब मुल्ला को भीख मांगते देखा तो उसका मजाक उड़ाने के लिए वे उसके सामने एक सोने का और एक चांदी का सिक्का रखते और मुल्ला से उनमें से कोई एक सिक्का चुनने को कहते. मुल्ला हमेशा चांदी का सिक्का लेकर उनको दुआएं देता और वे मुल्ला की खिल्ली उड़ाते.

मुल्ला का एक चाहनेवाला यह देखकर बहुत हैरान भी होता और दुखी भी. उसने एक दिन मौका पाकर मुल्ला से उसके अजीब व्यवहार का कारण पूछा – “मुल्ला, आप जानते हैं कि सोने के एक सिक्के की कीमत चांदी के कई सिक्कों के बराबर है फिर भी आप अहमकों की तरह हर बार चांदी का सिक्का लेकर अपने दुश्मनों को अपने ऊपर हंसने का मौका क्यों देते हैं.”

“मेरे अज़ीज़ दोस्त” – मुल्ला ने कहा – “मैंने तुम्हें सदा ही समझाया है कि चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी वो दिखती हैं. क्या तुम्हें वाकई ये लगता है कि वे लोग मुझे बेवकूफ साबित कर देते हैं? सोचो, अगर एक बार मैंने उनका सोने का सिक्का कबूल कर लिया तो अगली बार वे मुझे चांदी का सिक्का भी नहीं देंगे. हर बार उन्हें अपने ऊपर हंसने का मौका देकर मैंने चांदी के इतने सिक्के जमा कर लिए हैं कि मुझे अब खाने-पीने की फ़िक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं है.”

एक दिन मुल्ला के एक दोस्त ने उससे पूछा – “मुल्ला, तुम्हारी उम्र क्या है?”

मुल्ला ने कहा – “पचास साल.”

“लेकिन तीन साल पहले भी तुमने मुझे अपनी उम्र पचास साल बताई थी!” – दोस्त ने हैरत से कहा.

“हाँ” – मुल्ला बोला – “मैं हमेशा अपनी बात पर कायम रहता हूँ”.

“जब मैं रेगिस्तान में था तब मैंने खूंखार लुटेरों की पूरी फौज को भागने पर मजबूर कर दिया था” – मुल्ला ने चायघर में लोगों को बताया.

“वो कैसे मुल्ला!?” – लोगों ने हैरत से पूछा.

“बहुत आसानी से!” – मुल्ला बोला – “मैं उन्हें देखते ही भाग लिया और वे मेरे पीछे दौड़ पड़े!”

एक सुनसान रास्ते में घूमते समय नसरुद्दीन ने घोड़े पर सवार कुछ लोगों को अपनी और आते देखा. मुल्ला का दिमाग चलने लगा. उसने खुद को लुटेरों के कब्जे में महसूस किया जो उसकी जान लेने वाले थे. उसके मन में खुद को बचाने की हलचल मची और वह सरपट भागते हुए सड़क से नीचे उतरकर दीवार फांदकर कब्रिस्तान में घुस गया और एक खुली हुई कब्र में लेट गया.

घुडसवारों ने उसे भागकर ऐसा करते देख लिया. कौतूहलवश वे उसके पीछे लग लिए. असल में घुडसवार लोग तो साधारण व्यापारी थे. उन्होंने मुल्ला को लाश की तरह कब्र में लेटे देखा. flowers

“तुम कब्र में क्यों लेटे हो? हमने तुम्हें भागते देखा. क्या हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” – व्यापारियों ने मुल्ला से पूछा.

“तुम लोग सवाल पूछ रहे हो लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि हर सवाल का सीधा जवाब हो” – मुल्ला अब तक सब कुछ समझ चुका था – “सब कुछ देखने के नज़रिए पर निर्भर करता है. मैं यहाँ तुम लोगों के कारण हूँ, और तुम लोग यहाँ मेरे कारण हो”.

मुल्ला एक दिन दूसरे शहर गया और उसने वहां एक दूकान के सामने एक आदमी खड़ा देखा जिसकी दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई थी. मुल्ला ने उस आदमी से पूछा – “क्यों मियां, तुम दाढ़ी कब बनाते हो?”

उस आदमी ने जवाब दिया – “दिन में 20-25 बार.”

मुल्ला ने कहा – “क्यों बेवकूफ बनाते हो मियां!”

आदमी बोला – “नहीं. मैं नाइ हूँ.”

एक दिन मुल्ला का एक दोस्त उससे एक-दो दिन के लिए मुल्ला का गधा मांगने के लिए आया. मुल्ला अपने दोस्त को बेहतर जानता था और उसे गधा नहीं देना चाहता था. मुल्ला ने अपने दोस्त से यह बहाना बनाया कि उसका गधा कोई और मांगकर ले गया है. ठीक उसी समय घर के पिछवाड़े में बंधा हुआ मुल्ला का गधा रेंकने लगा.

गधे के रेंकने की आवाज़ सुनकर दोस्त ने मुल्ला पर झूठ बोलने की तोहमत लगा दी.

मुल्ला ने दोस्त से कहा – “मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता क्योंकि तुम्हें मेरे से ज्यादा एक गधे के बोलने पर यकीन है.”

एक बार मुल्ला को लगा कि लोग मुफ्त में उससे नसीहतें लेकर चले जाते हैं इसलिए उसने अपने घर के सामने इश्तेहार लगाया: “सवालों के जवाब पाइए. किसी भी तरह के दो सवालों के जवाब सिर्फ 100 दीनार में”

एक आदमी मुल्ला के पास अपनी तकलीफ का हल ढूँढने के लिए आया और उसने मुल्ला के हाथ में 100 दीनार थमाकर पूछा – “दो सवालों के जवाब के लिए 100 दीनार ज्यादा नहीं हैं?”

“नहीं” – मुल्ला ने कहा – “आपका दूसरा सवाल क्या है?”

नसरुद्दीन अपने घर के बाहर रोटियों के टुकड़े बिखेर रहा था.

उसे यह करता देख एक पड़ोसी ने पूछा – “ये क्या कर रहे हो मुल्ला!?”

“शेरों को दूर रखने का यह बेहतरीन तरीका है” – मुल्ला ने कहा.

“लेकिन इस इलाके में तो एक भी शेर नहीं है!” – पड़ोसी ने हैरत से कहा.

मुल्ला बोला – “तरीका वाकई कारगर है, नहीं क्या?”

मुल्ला अपने शागिर्दों के साथ एक रात अपने घर आ रहा था कि उसने देखा एक घर के सामने कुछ चोर खड़े हैं और ताला तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

मुल्ला को लगा कि ऐसे मौके पर कुछ कहना खतरे से खाली न होगा इसलिए वह चुपचाप चलता रहा. मुल्ल्ला के शागिर्दों ने भी यह नज़ारा देखा और उनमें से एक मुल्ला से पूछ बैठा – “वे लोग वहां दरवाजे के सामने क्या कर रहे हैं?

“श्श्श…” – मुल्ला ने कहा – “वे सितार बजा रहे हैं.”

“लेकिन मुझे तो कोई संगीत सुनाई नहीं दे रहा” – शागिर्द बोला.

“वो कल सुबह सुनाई देगा” – मुल्ला ने जवाब दिया.


एक दिन बाज़ार में कुछ गाँव वालों ने मुल्ला को घेर लिया और उससे बोले – “नसरुद्दीन, तुम इतने आलिम और जानकार हो. तुम हम सबको अपना शागिर्द बना लो और हमें सिखाओ कि हमें कैसी ज़िन्दगी जीनी चाहिए और क्या करना चाहिए”.

मुल्ला ने कुछ सोचकर कहा – “ठीक है. सुनो. मैं तुम्हें पहला सबक यहीं दे देता हूँ. सबसे ज़रूरी बात यह है कि हमें अपने पैरों की अच्छी देखभाल करनी चाहिए और हमारी जूतियाँ हमेशा दुरुस्त और साफसुथरी होनी चाहिए”.

लोगों ने मुल्ला की बात बहुत आदरपूर्वक सुनी. फिर उनकी निगाह मुल्ला के पैरों की तरफ गई. मुल्ला के पैर बहुत गंदे थे और उसकी जूतियाँ बेहद फटी हुई थीं.

किसी ने मुल्ला से कहा – “नसरुद्दीन, लेकिन तुम्हारे पैर तो बहुत गंदे हैं और तुम्हारी जूतियाँ भी इतनी फटी हैं कि किसी भी वक़्त पैर से अलग हो जाएँगी. तुम खुद तो अपनी सीख पर अमल नहीं करते हो और हमें सिखा रहे हो कि हमें क्या करना चाहिए!”

“अच्छा!” – मुल्ला ने कहा – “लेकिन मैं तो तुम लोगों की तरह किसी से ज़िन्दगी जीने के सबक सिखाने की फरियाद नहीं करता!”


आधी रात के वक़्त घर के बाहर दो व्यक्तियों के झगड़ने की आवाज़ सुनकर मुल्ला की नींद खुल गई. कुछ वक़्त तक तो मुल्ला इंतज़ार करता रहा कि दोनों का झगड़ा ख़त्म हो जाये और उसे फिर से नींद आ जाये लेकिन झगड़ा जारी रहा.

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. मुल्ला अपने सर और बदन को कसकर रजाई से लपेटकर घर के बाहर आया. उसने उन दोनों झगड़ा करनेवालों को अलग करने की कोशिश की. वे दोनों तो अब मारपीट पर उतारू हो गए थे.

मुल्ला ने जब उन दोनों को न झगड़ने की समझाइश दी तो उनमें से एक आदमी ने यकायक मुल्ला की रजाई छीन ली और फिर दोनों आदमी भाग गए.

नींद से बोझिल और थका हुआ मुल्ला घर में दाखिल होकर बिस्तर पर धड़ाम से गिर गया. मुल्ला की बीबी ने पूछा – “बाहर झगड़ा क्यों हो रहा था?”

“रजाई के कारण” – मुल्ला ने कहा – “रजाई चली गई और झगडा ख़तम हो गया”.


 एक  दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर बैठकर किसी दूसरे शहर से अपने गाँव आया. लोगों ने उसे रोककर कहा – “मुल्ला, तुम अपने गधे पर सामने पीठ करके क्यों बैठे हो?” मुल्ला ने कहा – “मैं यह जानता हूँ कि मैं कहाँ जा रहा हूँ लेकिन मैं यह देखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से आ रहा हूँ.


उसी शाम मुल्ला रसोई में कुछ बना रहा था. वह अपने पड़ोसी के पास गया और उससे एक बरतन माँगा और वादा किया कि अगली सुबह उसे वह बरतन लौटा देगा.

अगले दिन मुल्ला पड़ोसी के घर बरतन लौटाने के लिए गया. पडोसी ने मुल्ला से अपना बरतन ले लिया और देखा कि उसके बरतन के भीतर वैसा ही एक छोटा बरतन रखा हुआ था. पड़ोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! यह छोटा बरतन किसलिए?” मुल्ला ने कहा – “तुम्हारे बरतन ने रात को इस बच्चे बरतन को जन्म दिया इसलिए मैं तुम्हें दोनों वापस कर रहा हूँ.”

पड़ोसी को यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई और उसने वे दोनों बरतन मुल्ला से ले लिए. अगले ही दिन मुल्ला दोबारा पड़ोसी के घर गया और उससे पहलेवाले बरतन से भी बड़ा बरतन माँगा. पडोसी ने ख़ुशी-ख़ुशी उसे बड़ा बरतन दे दिया और अगले दिन का इंतज़ार करने लगा.

एक हफ्ता गुज़र गया लेकिन मुल्ला बरतन वापस करने नहीं आया. मुल्ला और पडोसी बाज़ार में खरीदारी करते टकरा गए. पडोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! मेरा बरतन कहाँ है?” मुल्ला ने कहा – “वो तो मर गया!” पडोसी ने हैरत से पूछा – “ऐसा कैसे हो सकता है? बरतन भी कभी मरते हैं!” मुल्ला बोला – “क्यों भाई, अगर बरतन जन्म दे सकते हैं तो मर क्यों नहीं सकते?”

* * * * *

एक दिन मुल्ला और उसका एक दोस्त कहवाघर में बैठे चाय पी रहे थे और दुनिया और इश्क के बारे में बातें कर रहे थे. दोस्त ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! तुम्हारी शादी कैसे हुई?”

मुल्ला ने कहा – “यार, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा. मैंने अपनी जवानी सबसे अच्छी औरत की खोज में बिता दी. काहिरा में मैं एक खूबसूरत, और अक्लमंद औरत से मिला जिसकी आँखें जैतून की तरह गहरी थीं लेकिन वह नेकदिल नहीं थी. फिर बग़दाद में भी मैं एक औरत से मिला जो बहुत खुशदिल और सलीकेदार थी लेकिन हम दोनों के शौक बहुत जुदा थे. एक के बाद दूसरी, ऐसी कई औरतों से मैं मिला लेकिन हर किसी में कोई न कोई कमी पाता था. और फिर एक दिन मुझे वह मिली जिसकी मुझे तलाश थी. वह सुन्दर थी, अक्लमंद थी, नेकदिल थी और सलीकेदार भी थी. हम दोनों में बहुत कुछ मिलता था. मैं तो कहूँगा कि वह पूरी कायनात में मेरे लिए ही बनी थी…” दोस्त ने मुल्ला को टोकते हुए कहा – “अच्छा! फिर क्या हुआ!? तुमने उससे शादी कर ली!”

मुल्ला ने ख्यालों में खोए हुए चाय की एक चुस्की ली और कहा – “नहीं दोस्त! वो तो दुनिया के सबसे अच्छे आदमी की तलाश में थी.”

* * * * *







मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा खो गया
1 एक दिन मुल्ला बाज़ार गया और उसने एक इश्तेहार लगाया जिसपर लिखा था : “जिसने भी मेरा गधा चुराया है वो मुझे उसे लौटा दे. मैं उसे वह गधा ईनाम में दे दूंगा”.

“नसरुद्दीन!” – लोगों ने इश्तेहार पढ़कर कहा – “ऐसी बात का क्या मतलब है!? क्या तुम्हारा दिमाग फिर गया है?”

“दुनिया में दो ही तरह के तोहफे सबसे अच्छे होते हैं” – मुल्ला ने कहा – “पहला तो है अपनी खोई हुई सबसे प्यारी चीज़ को वापस पा लेना, और दूसरा है अपनी सबसे प्यारी चीज़ को ही किसी को दे देना.”

2 एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा खो गया | जो उसे बहुत ही प्रिय था । सब जगह दूंढा लेकिन फिर भी मुल्ला के हाथ निराशा ही लगी । गाँव के लोग भी मुल्ला नसीरुद्दीन की मदद के लिए आगे आये और पूरा गाँव खोज डाला गया लेकिन मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा कंही नहीं मिला इस पर लोग भी हताश होकर कहने लगे गाँव में तो कंही नहीं है इसका मतलब तीर्थ यात्रा जाने वाले कारवें के साथ कंही निकल गया है सो उसे और खोजना भी व्यर्थ है कहकर वो अपने अपने घरों को चले गये ।

मुल्ला नसीरुद्दीन ने सोचा जब इतना खोज लिया है तो एक आखिरी उपाय और करलूं यह सोचकर वह अपने हाथों और पेरो के बल गधे के जैसे ही खड़ा हो गया और इधर उधर घूमने लगा और अपने घर मकान बगीचे का चक्कर लगा कर वह ठीक उसी गड्ढे के पास पहुँच गया जिसमे उसका प्रिय गधा गिरा हुआ उसे मिल गया ।

गाँव वाले सब हैरान हुए कहने लगे मुल्ला ये कौनसी तरकीब तुमने निकली हद ही हो गयी । तो मुल्ला कहने लगा जब आदमी बन गधे को खोजा तो कंही नही  मिला तो सोचा कि गधे की कुंजी आदमी के पास तो है नहीं सोचकर मैं मन में भावना की मैं गधा हूँ और गधा होता तो कन्हा कन्हा जाता और कंहा दूसरे गधे को तलाश करता और मुझे मेरा गधा इस गड्ढे में पड़ा हुआ मिल गया । मुझे नहीं पता मैं कैसे इस गद्दे के पास आया लेकिन बस ये हो गया ।


मुल्ला और पड़ोसी
एक पड़ोसी मुल्ला नसरुद्दीन के द्वार पर पहुंचा . मुल्ला उससे मिलने बाहर निकले . “ मुल्ला क्या तुम आज के लिए अपना गधा मुझे दे सकते हो , मुझे कुछ सामान दूसरे शहर पहुंचाना है ? ”

मुल्ला उसे अपना गधा नहीं देना चाहते थे , पर साफ़ -साफ़ मन करने से पड़ोसी को ठेस पहुँचती इसलिए उन्होंने झूठ कह दिया , “ मुझे माफ़ करना मैंने तो आज सुबह ही अपना गधा किसी उर को दे दिया है .”

मुल्ला ने अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि अन्दर से ढेंचू-ढेंचू की आवाज़ आने लगी .

“ लेकिन मुल्ला , गधा तो अन्दर बंधा चिल्ला रहा है .”, पड़ोसी ने चौकते हुए कहा .

“ तुम किस पर यकीन करते हो .”, मुल्ला बिना घबराए बोले , “ गधे पर या अपने मुल्ला पर ?”

पडोसी चुपचाप वापस चला गया .


बेवकूफ कौन
मुल्ला की शोहरत इतनी ज्यादा हो चली थी कि आसपास के इलाकों में उनसे जलने वाले भी कम नहीं थे। वह जितना बेहतर करते कुछ लोग उतनी ही जलन रखते। पड़ोसी कस्बे का एक शख्स बहुत जल-भुन कर इस नतीजे  पर पहुंचा कि अब बहुत हो गया, क्यों न मुल्ला के घर ही पहुंचकर उनके इल्म से दो-दो हाथ कर लिए जाएं। मुल्ला को पता लगा कि कोई शख्स उन्हें मात खिलाने को उतावला हो रहा है तो अच्छे मेजबान की तरह उन्होंने पहल की और खुद ही उसे आने का न्योता भेज दिया। वो शख्स मुल्ला से बहस के लिए उनके घर पहुंचा तो उसने दरवाजे पर ताला लगा पाया। मुल्ला को न पाकर वह आग-बबूला हो उठा और कहने लगा - 'मुझे घर बुलाकर खुद गायब हो गया कायर।' जाते-जाते वो उनके दरवाजे पर लिख गया 'बेवकूफ।' जब मुल्ला लौटकर आए तो उन्होंने अपने दरवाजे पर ‘बेवकूफ‘ लिखा देखा और उल्टे पांव उस शख्स के घर रवाना हो गए। वहां पहुंचकर उन्होंने दरवाजा बजाया। दरवाजा खुलते ही मुल्ला ने कहा - ‘जनबा, आप मेरे यहां आए थे बहस के लिए, अफसोस! उस वक्त मैं घर पर नहीं था। दरअसल, मैं बहस की बात ही भूल गया था, लेकिन दरवाजे पर आपके दस्तखत देखते ही मुझे याद आ गया और मैं चला आया।'

यह तो अच्छा हुआ कि.....
सुल्तान से तोहफे में मिली जमीन से मुल्ला खूब फायदा उठाए जा रहे थे। पिछले दफे उन्होंने खजूर लगाए और अच्छी आमद पर टोकरी भरकर सुल्तान को दी। मीठे खजूर खाकर सुल्तान बेहद खुश हुए कि मुल्ला ने जमीन और सुल्तान दोनों का अच्छा ख्याल रखा है। इस बार मुल्ला नसरूद्दीन ने खजूर नहीं तरबूज बोए। फसल अच्छी आई तो उन्होंने सोचा कि क्यों न सुल्तान के यहां बोरा भरकर तरबूज दे आऊं। जब वह बोरा उठाए जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें अपना पुराना हमदर्द दोस्त मिल गया जो कभी-कभार उन्हें नेक सलाह दे दिया करता था। दोस्त ने पूछा ‘कहां जा रहे हो? यह बोरी भरे तरबूज लेकर।'

मुल्ला ने कहा - 'सुल्तान को तोहफे में देने जा रहा हूं।' दोस्त बोला - 'तुम मूर्ख हो! भला सुल्तान इतने सारे तरबूजों का क्या करेगा? फिर तरबूज भी कोई तोहफे में देने की चीज है। अरे तुम तोहफा देना ही चाहते हो तो कोई अच्छी चीज दो। क्यों नहीं लाल फूल दे देते।' मुल्ला ने सोचा दोस्त सही कह रहा है, वाकई, फूल अच्छा तोहफा साबित होंगे? उन्होंने फूलों का गुच्छा तैयार करवाया और लेकर पहुंच गए सुल्तान के दरबार में। यह मुल्ला की बदनसीबी ही थी कि उस वक्त सुल्तान का दिमाग ठीक नहीं था। वह किसी बात से बेगम पर भड़क तो रहे थे पर अपना गुस्सा नहीं उतार पर रहे थे। तभी उनकी नज़र मुल्ला के गुलदस्ते पर पड़ी। और उन्होंने फूल छीनकर उसी के मुंह पर दे मारे। सुल्तान का मिजाज भांपते ही मुल्ला ने अब वहां से चुपचाप खिसकने में ही खैरियत समझी। रास्ते भर अपनी तकदीर का शुक्रिया अदा किए जा रहे मुल्ला सितारों की ओर हाथा उठा-उठाकर कहे जा रहे थे- 'वो तो अच्दा हुआ जो रास्ते में दोस्त मिल गया और उसने तोहफे में फूल देने की सलाह दे डाली। अगर उसकी न मानकर मैं बोरी भरे तरबूज ले जाता तो वह सब मेरे मुंह पर पड़ते, मैं तो मर ही जाता।'



पैर जो जला है
तर्क गढ़ने और बात टालने में मुल्ला का कभी कोई सानी नहीं रहा। अगर उन्हें कोई काम करना है तो वह कैसे भी करेंगे ही और अगर नहीं करना तो फिर बहानों की उन्हें क्या कमी? एक गरीब अनपढ़ उनका उनका वक्त जाया करने आ गया। वह चाहता था मुल्ला उनके लिए एक खत लिखें जो वह अपने भाई के पास भेजने की चाह में था। उसकी फरमाइश सुनकर मुल्ला ने कहा- 'यह तो नामुमकिन है, तुम देख रहे हो मेरा पांव जला हुआ है।' गरीब आदमी को हैरत हुई कि यह क्या बात। उसने मुल्ला के लिए खुदा से खैरियत मांगते हुए पूछा कि - 'जले हुए पैर का भला मेरे खत से क्या ताल्लुक। चिट्ठी तो हाथ से लिखी जाती है। मैं तो तुम्हारा मतलब समझ नहीं पा रहा हूं।' मुल्ला ने कहा- 'मेरे कहे का बहुत बड़ा मतलब है, अगर तुम उसे समझ सको तो समझो।‘ बुखार में सबको पता है कि मेरी लिखावट इतनी खराब है कि मेरा लिखा सिर्फ मैं ही समझ पाता हूं और कोई नहीं। अगर मैं तुम्हारे भाई को खत लिखूंगा तो वह पढ़ नहीं पाएगा। खत में क्या लिखा है यह पढ़कर सुनाने मुझे उसके गांव जाना पड़ेगा और तुम तो देख ही रहे हो पैर जलने से मैं कहीं भी जाने से लाचार हूं। इसलिए तुम किसी और को ढूंढ़कर उससे खत लिखा लो।'


मुल्ला नसरुद्दीन के अजीबो गरीब प्रयोग

युद्ध के समय सेना में जबरदस्ती लोगों को भर्ती किया जा रहा था। उन्हीं लोगों में मुल्ला नसरुद्दीन को भी पकड़ लाया गया था। मुल्ला को सभी परीक्षणों से गुजारा गया और उसने सभी परीक्षणों से बचने की कोशिश की। गलत—सही जवाब दिए, उलटे—सीधे उत्तर लिखे, मगर फिर भी उसे खरा साबित कर दिया गया। उन्हें तो भर्ती करना ही था। मुल्ला परेशान था, क्योंकि वह सेना में भर्ती नहीं होना चाहता था। अंतिम परीक्षण नेत्र—परीक्षण था। मुल्ला को एक बड़े बोर्ड के समक्ष ले जाया गया, जिस पर वर्णमाला के अनेक अक्षर, अनेक चिह्न, अनेक प्रकार के निशान बने हुए थे।

अच्छा यह तो बताओ जरा नसरुद्दीन कि यह कौन सा अक्षर है? चुनाव अधिकारी ने एक अक्षर की ओर इशारा करते हुए नसरुद्दीन से पूछा। मुल्ला ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा महोदय, मुझे कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा कि वह क्या है। अधिकारी ने पूछा कि तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है अक्षर? मुल्ला ने कहा अक्षर! मुझे बोर्ड नहीं दिखाई पड़ रहा। अधिकारी ने बड़े बोर्ड बुलवाए। बड़े—बड़े अक्षरों वाले बोर्ड। मगर वह हमेशा यही कहे, मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा— कहां बोर्ड है? कहां अक्षर है?

हार कर अधिकारियों ने… कुछ सूझा नहीं तो अंततः एक थाली बुलवाई और चिढ़ कर मुल्ला से पूछा, नसरुद्दीन! हाथ में रखो, देखो इसको, अब तो बता दो कि यह क्या है? या कि इसे भी नहीं पहचानते? नसरुद्दीन ने गौर से देखा थाली को और कहा : अरे, यह मेरी अठन्नी कहां मिली आपको! इसे मैं तीन दिन से खोज रहा हूं।

सिर ठोक लिया अधिकारियों ने— कहा, ठीक है। छुट्टी पाई वहां से। नसरुद्दीन बाहर निकला प्रसन्नता में, पास ही जाकर एक मेटिनी शो में बैठ गया। जब इंटरवल हुआ और प्रकाश हुआ तो वह देख कर चकित हुआ कि बगल में वही अधिकारी बैठा हुआ है। उसके तो प्राण निकल गए! इसके पहले कि अधिकारी कुछ कहे— कि तुम्हें थाली अठन्नी दिखाई पड़ती थी और इतने दूर बैठ कर तुम्हें फिल्म मजे से दिखाई पड़ रही है; और बोर्ड तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता था, अक्षर की तो बात ही क्या थी— इसके पहले कि अधिकारी कुछ कहे, अधिकारी कहने ही कहने को था कि नसरुद्दीन ने कहा कि महोदय, यह बस कहां जा रही है?


मुल्ला बने कम्युनिस्ट

एक बार खबर फैली की मुल्ला नसरुदीन कम्युनिस्ट बन गए हैं . जो भी सुनता उसे आश्चर्य होता क्योंकि सभी जानते थे की मुल्ला अपनी चीजों को लेकर कितने पोजेसिव हैं .

जब उनके परम मित्र ने ये खबर सुनी तो वो तुरंत मुल्ला के पास पहुंचा .

मित्र : “ मुल्ला क्या तुम जानते हो कम्युनिज्म का मतलब क्या है ?”
मुल्ला : “हाँ , मुझे पता है .”

मित्र : “ क्या तुम्हे पता है अगर तुम्हारे पास दो कार है और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपनी एक कार देनी पड़ेगी ”
मुल्ला : “ हाँ , और मैं अपनी इच्छा से देने के लिए तैयार हूँ .”

मित्र : “ अगर तुम्हारे पास दो बंगले हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक बंगला देना होगा ?”
मुल्ला : “ हाँ , और मैं पूरी तरह से देने को तैयार हूँ .”

मित्र :” और तुम जानते हो अगर तुम्हारे पास दो गधे हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक गधा देना पड़ेगा ?”
मुल्ला : “ नहीं , मैं इस बात से मतलब नहीं रखता , मैं नहीं दे सकता , मैं बिलकुल भी ऐसा नहीं कर सकता .”

मित्र : “ पर क्यों , यहाँ भी तो वही तर्क लागू होता है ?”
मुल्ला : “ क्योंकि मेरे पास कार और बंगले तो नहीं हैं , पर दो गधे ज़रूर हैं .”


मुल्ला का प्रवचन

एक बार मुल्ला नसरुदीन को प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया गया . मुल्ला समय से पहुंचे और स्टेज पर चढ़ गए , “ क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ? मुल्ला ने पूछा .

“नहीं ” बैठे हुए लोगों ने जवाब दिया .

यह सुन मुल्ला नाराज़ हो गए ,” जिन लोगों को ये भी नहीं पता कि मैं क्या बोलने वाला हूँ मेरी उनके सामने बोलने की कोई इच्छा नहीं है . “ और ऐसा कह कर वो चले गए .

उपस्थित लोगों को थोड़ी शर्मिंदगी हुई और उन्होंने अगले दिन फिर से मुल्ला नसरुदीन को बुलावा भेज .

इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न दोहराया , “ क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?”

“हाँ ”, कोरस में उत्तर आया .

“बहुत अच्छे जब आप पहले से ही जानते हैं तो भला दुबारा बता कर मैं आपका समय क्यों बर्वाद करूँ ”, और ऐसा खेते हुए मुल्ला वहां से निकल गए .

अब लोग थोडा क्रोधित हो उठे , और उन्होंने एक बार फिर मुल्ला को आमंत्रित किया .

इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न किया , “क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?”

इस बार सभी ने पहले से योजना बना रखी थी इसलिए आधे लोगों ने “हाँ ” और आधे लोगों ने “ना ” में उत्तर दिया .

“ ठीक है जो आधे लोग जानते हैं कि मैं क्या बताने वाला हूँ वो बाकी के आधे लोगों को बता दें .”

फिर कभी किसी ने मुल्ला को नहीं बुलाया !

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