जीवन, अपनी समग्रता में, एक निरंतर प्रवाह है—जहाँ हर अनुभव की गंध समय के साथ मिटती नहीं, बल्कि भावों के रूप में सजीव रहती है। “खुशबू का पथ” इसी संवेदना की यात्रा है—जहाँ मिट्टी की सौंधी आहट में मानवीय हृदय का स्पंदन मिलता है। यह कविता प्रकृति, प्रेम, विरह, स्मृति और पुनर्जागरण की उस मधुर लय को खोजती है, जहाँ हर क्षण कुछ समाप्त होकर फिर से जन्म लेता है। यह खुशबू केवल फूलों की नहीं, बल्कि आत्मा की है—जो स्थिर नहीं, बस चलती रहती है... समय के पार, मन की गहराई तक। चलती हवा में महके सपनों की कोई डोरी, फूलों के मन की बाँहे ख़ुशबू ने थोड़ी जोरी। छू ले जो रूह को बनकर अरमानों की धुन, ऐसी ही ख़ुशबू में बसती है कोई कहानी पूरी। खुशबू तो बस देह नहीं—मन का अनुभव है, रह जाती जो छूने के बाद भी अछूती लहर है। मिट्टी से उठकर आकाश में घुलती जाती, शायद यही बताती—क्षणभंगुरता ही सत्य कहर है। ओस की बूँद पे जब सूरज मुस्कुराता है, मिट्टी की खुशबू मन को गीत सुनाता है। पवन के संग बहती यह सृष्टि की सरगम, हर श्वास बताती—जीवन बस लौट आता है। बिन देखे जिसे मन हर क्षण पहचानता है, वही तो खुशबू है जो भीतर विराजता है। दीपक ...