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उपलब्धि | upalabdhi

मैं क्या जिया ? मुझको जीवन ने जिया - बूँद-बूँद कर पिया, मुझको पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया मैं क्या जला ? मुझको अग्नि ने छला - मैं कब पूरा गला, मुझको थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया देखो मुझे हाय मैं हूँ वह सूर्य जिसे भरी दोपहर में अँधियारे ने तोड़ दिया ! ----------- धर्मवीर भारती  (1926-1997)