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Showing posts from January, 2017

ठुकरा दो या प्यार करो

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एक गहन भाव से भरी, एवं समर्पण भाव से आप्लावित,सुभद्रा कुमारी चौहान की यह  कविता " ठुकरा दो या प्यार करो " में उन्होंने इस चिर सत्य का रूप निर्धारित किया है कि पूजा तथा अर्चन के निमित्त किसी वस्तु की जरूरत नही है। मनुष्य के भाव यदि अमल और धवल हैं तो भगवान भक्त को भी उसी दृष्टि से देखता है । अपनी भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर कवयित्री ने इस कविता में यह संदेश देने का प्रयस किया है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं,उन्हे प्रसन्न करने के लिए भक्तों के निर्मल मन का प्रेम ही पर्याप्त है।
देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं । सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं ॥ धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं । मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥ मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी । फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी ॥ धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं । हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं ॥ मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? है स्वर में माधुर्य नहीं । मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं ॥ नहीं दान है, नहीं दक्ष…

मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी

मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी तू की जाने प्यार मेरा मैं करूं इंतजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी तू की जाने प्यार मेरा मैं करूं इंतजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी मेरे दिल ने चुनलैयाने तेरे दिल दिया राहां तू जो मेरे नाल तू रहता तुरपे मेरीया साहा जीना मेरा होए हुण्ड है तेरा की मैं करां तू कर ऐतबार मेरा मैं करूं इन्तेजार तेरा तू दिल तूयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी वे चंगा नहियों कीता बिवा वे चंगा नहियों कीता बिवा दिल मेरा तोड़ के वे बड़ा पछताइयां अखां वे बड़ा पछताइयां अखां नाल तेरे जोड़ के तेनु छड्ड के कित्थे जावां तू मेरा परछांवा तेरे मुखड़े विच ही मैं तान रब नू अपने पावां मेरी दुआ हाय सजदा तेरा करदी सदा तू सुन इक़रार मेरा मैं करूं इंतज़ार तेरा तू दिल तुइयो जान मेरी मैं तेनु समझावां की ना तेरे बिना लगदा जी

व्यंग्य: आलस्य-भक्त by Babu Gulabrai

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अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम ।। 1

प्रिय ठलुआ-वृंद! यद्यपि हमारी सभा समता के पहियों पर चल रही है और देवताओं की भांति हममें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, तथापि आप लोगों ने मुझे इस सभा का पति बनाकर मेरे कुंआरेपन के कलंक को दूर किया है। नृपति और सेनापति होना मेरे स्‍वप्‍न से भी बाहर था। नृपति नहीं तो नारी-पति होना प्रत्‍येक मनुष्‍य की पहुंच के भीतर है, किंतु मुझ-ऐसे आलस्‍य-भक्‍त के लिए विवाह में पाणिग्रहण तक का तो भार सहना गम्‍य था। उसके आगे सात बार अग्नि की परिक्रमा करना जान पर खेलने से कम न था। जान पर खेल कर जान का जंजाल खरीदना मूर्खता ही है - 'अल्‍पस्‍य हेतोर्बहु हातुमिच्‍छन्, विचारमूढ: प्रतिभासि मे त्‍वम्' का कथन मेरे ऊपर लागू हो जाता। 'ब्‍याहा भला कि क्‍वांरा' - वाली समस्‍या ने मुझे अनेक रात्रि निद्रा देवी के आलिंगन से वंचित रखा था, किंतु जब से मुझे सभापतित्‍व का पद प्राप्‍त हुआ है, तब से यह समस्‍या हल हो गई है। आलसी के लिए इतना ही आराम बहुत है। यद्यपि मेरे सभापति होने की योग्‍यता में तो आप लोगों को संदेह करने के लिए कोई स्‍थान नहीं है, तथ…

नव वर्ष की बहुत-बहुत शुभ-कामनायें

कल की नई सुबह इतनी
           सुहानी हो जाए;
    आपके दुखों की सारी बातें
            पुरानी हो जाएं;
      दे जाए इतनी खुशियां
            ये नव वर्ष आपको;
       कि ख़ुशी भी आपके
            मुस्कुराहट की
           दीवानी हो जाएं ।..आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की बहुत-बहुत शुभ-कामनायें