Skip to main content

श्लोक


विश्वेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,लंबोदराय सकलाय जगध्दिताय।
नागाननाय श्रुतियग्यविभुसिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेन्यं। भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात् ।।

शांताकारम भुजगशयनम पद्यनाभम् सुरेशम् । विश्‍वाधारं गगन सदृसं मेघवर्णम् शुभांगम् ।
लक्ष्मीकांतम् कमलनयनम् योगीभर्ध्यानगम्यम । वंदे विष्णूम भवभयहरम सर्वलोकैय नाथम ॥

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥

करपूर गौरम करूणावतारम संसार सारम भुजगेन्द्र हारम |
सदा वसंतम हृदयारविंदे भवम भवानी सहितं नमामि ||

मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुड़ध्वजः | मंगलम पुन्डरीकाक्षो मंगलायतनो हरि ||

सर्व मंगल मांग्लयै शिवे सर्वार्थ साधिके | शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ||

त्वमेव माता च पिता त्वमेव | त्वमेव बंधू च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव | त्वमेव सर्वं मम देव देव ||

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा
बुध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात
करोमि यध्य्त सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि ||

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव |
जिब्हे पिबस्व अमृतं एत देव गोविन्द दामोदर माधवेती ||

Comments

Popular posts from this blog

हिन्दी की किताबे | Read hindi stories online

Image via Wikipediaहिन्दी की किताबेपुरानी पोस्ट : क्लिक करेंहिन्दी की किताबे

माँ - कहानी (प्रेमचंद)ईदगाह - कहानी (प्रेमचंद)अलग्योझा - कहानी (प्रेमचंद)इस्तीफा - कहानी (प्रेमचंद)कप्तान साहब -कहानी (प्रेमचंद)प्रायश्चित - कहानी (प्रेमचंद)बैंक का दिवाला - कहानी (प्रेमचंद)शान्ति - कहानी (प्रेमचंद)समर-यात्रा - कहानी (प्रेमचंद)मैकू - कहानी (प्रेमचंद)झाँकी - कहानी (प्रेमचंद)पूस की रात -कहानी (प्रेमचंद)ठाकुर का कुआँ -कहानी (प्रेमचंद)स्वामिनी - कहानी (प्रेमचंद)नाग-पूजा -कहानी (प्रेमचंद)शंखनाद - कहानी (प्रेमचंद)दुर्गा का मन्दिर - कहानी (प्रेमचंद)आत्माराम - कहानी (प्रेमचंद)पंच परमेश्वर - कहानी (प्रेमचंद)बड़े घर की बेटी - कहानी (प्रेमचंद)चतुर नाई (बाल-कहानी)रत्ना भाई (बाल-कहानी)कंजूस सेठ (कहानी)मुर्ख बहु (बाल-कहानी)आनंदी कौआ (बाल-कहानी)मुर्ख कौआ (बाल-कहानी)तिवारी जी (कहानी)नकलची नाई (कहानी)करामाती तुम्बी (बाल-कहानी)बोहरा और बोहरी (बाल-कहानी)चतुर खरगोश - बाल-कहानीकुनबी और कुनबिन- कहानीचोर और राजा (कहानी)कौआ और मैना (बाल-कहानी)गिलहरीबाई (बाल-कहानी)राजा और चिड़िया (बाल-कहानी)टिड्डा जोशी (बाल-कहानी)मगर…

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र
प्रतापनारायण मिश्र (सितंबर, 1856 - जुलाई, 1894) भारतेंन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। पंडित जी का जन्म उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव निवासी, कात्यायन गोत्रीय, कान्यकुब्ज ब्राहृमण पं. संकटादीन के घर आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था।वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रतिभारतेंदु" अथवा "द्वितीयचंद्र" कहे जाने लगे थे।
बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे और अक्षरारंभ के पश्चात् उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे। किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अँगरेजी मदरसे में भरती करा दिया। तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष की…

पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

डॉ॰ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (27 मई 1894-28 दिसम्बर 1971) जिन्हें ‘मास्टरजी’ के नाम से भी जाना जाता है, हिंदी के निबंधकार थे। वे राजनंदगांव की हिंदी त्रिवेणी की तीन धाराओं में से एक हैं। राजनांदगांव के त्रिवेणी परिसर में इनके सम्मान में मूर्तियों की स्थापना की गई है।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म राजनांदगांव के एक छोटे से कस्‍बे खैरागढ़ में 27 मई 1894 में हुआ। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी खैरागढ़ के प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा म.प्र. के प्रथम मुख्‍यमंत्री पं॰ रविशंकर शुक्‍ल जैसे मनीषी गुरूओं के सानिध्‍य में विक्‍टोरिया हाई स्‍कूल, खैरागढ में हुई थी। प्रारंभ से ही प्रखर पदुमलाल पन्‍नालाल बख्‍शी की प्रतिभा को खैरागढ के ही इतिहासकार लाल प्रद्युम्‍न सिंह जी ने समझा एवं बख्‍शी जी को साहित्‍य सृजन के लिए प्रोत्‍साहित किया और यहीं से साहित्‍य की अविरल धारा बह निकली। प्रतिभावान बख्‍शी जी ने बनारस हिन्‍दू कॉलेज से बी.ए. किया और एल.एल.बी. करने लगे किन्‍तु वे साहित्‍य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं समयाभाव के कारण एल.एल.बी. पूरा नहीं कर पाए।

यह 1903 का समय था जब वे घर के साहित्यि…