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जब तक जाना खुद को ...

जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी. वक़्त  कैसे  फ़िसला  हाथ  से, सुइया  तो अबभी  वहीँ  थमी  थी. समझ  के  जिसको  अपना  इठला  रहा  था, वो  तो  कहीं  और  खड़ी  थी. जिसे  समझा  मैने  दूर अपने से, वो  तो  मुझसे  ही  जुडी  थी. समझा  देर  से, कोई  बात  नहीं; लेकिन  देर  बहुत  हो  चली  थी. जब  तक जाना  खुद   को, मौत सामने खड़ी  थी  जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी.

राही मासूम रज़ा

जन्म: 01 सितंबर 1927
निधन: 15 मार्च 1992
जन्म स्थान गंगौली, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद, दिल एक सादा काग़ज़, अजनबी शहर:अजनबी रास्ते, मैं एक फेरी वाला ग़रीबे शहर
राही मासूम रज़ा (१ सितंबर, १९२५-१५ मार्च १९९२) का जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर कर…

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र

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स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र
प्रतापनारायण मिश्र (सितंबर, 1856 - जुलाई, 1894) भारतेंन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। पंडित जी का जन्म उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव निवासी, कात्यायन गोत्रीय, कान्यकुब्ज ब्राहृमण पं. संकटादीन के घर आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था।वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रतिभारतेंदु" अथवा "द्वितीयचंद्र" कहे जाने लगे थे।
बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे और अक्षरारंभ के पश्चात् उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे। किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अँगरेजी मदरसे में भरती करा दिया। तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष की…

भवानी प्रसाद मिश्र

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भवानी प्रसाद मिश्र'(२९ मार्च १९१३-२०फरवरी १९८५) का जन्म गांव टिगरिया, तहसील सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद में हुआ था। वे हिन्दी के प्रमुख कवियों में से एक थे। क्रमश: सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर में उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई तथा १९३४-३५ में उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत विषय लेकर बी ए पास किया। गांधी जी के विचारों के अनुसार शिक्षा देने के विचार से एक स्कूल खोलकर शुरू किया और उस स्कूल को चलाता हुए ही १९४२ में गिरफ्तार होकर १९४५ में छूटे। उसी वर्ष महिलाश्रम वर्धा में शिक्षक की तरह चले गए और चार पाँच साल वर्धा में बिताए। कविताएँ लिखना लगभग १९३० से नियमित प्रारम्भ हो गया था और कुछ कविताएँ पंडित ईश्वरी प्रसाद वर्मा के सम्पादन में निकलने वाले हिन्दूपंच में हाईस्कूल पास होने के पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं। सन १९३२-३३ में वे माखनलाल चतुर्वेदी के संपर्क में आए और वे आग्रहपूर्वक कर्मवीर में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ प्रकाशित करते रहे। हंस में काफी कविताएँ छपीं और फिर अज्ञेय जी ने दूसरे सप्तक में इन्हे प्रकाशित किया। दूसरे सप्तक के प्रकाशन के बाद प्रकाशन क्रम ज्यादा निय…

सब जीवन बीता जाता है

सब जीवन बीता जाता है

सबजीवनबीताजाताहै
धूपछाँहकेखेलसदॄश
सबजीवनबीताजाताहै

समयभागताहैप्रतिक्षणमें,
नव-अतीतकेतुषार-कणमें,
हमेंलगाकरभविष्य-रणमें,
आपकहाँछिपजाताहै
सबजीवनबीताजाताहै

बुल्ले, नहर, हवाकेझोंके,
मेघऔरबिजलीकेटोंके,
किसकासाहसहैकुछरोके,
जीवनकावहनाताहै
सबजीवनबीताजाताहै

वंशीकोबसबजजानेदो,
मीठीमीड़ोंकोआनेदो,
आँखबंदकरकेगानेदो
जोकुछहमकोआताहै

सबजीवनबीताजाताहै.

जयशंकर प्रसाद
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