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हिंदी साहित्य की कालजयी और आधुनिक प्रसिद्ध रचनायें - कविता

काव्य नाटक अंधायुग - धर्मवीर भारती   कुरुक्षेत्र - रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ कामायनी - जयशंकर प्रसाद राम की शक्ति पूजा - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला गीतांजलि - रविंद्रनाथ ठाकुर

दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा

नवयौवना का सा श्रृंगार प्रकृति, नव निश्छल बहता जा प्रेम पथिक । धरा अजर अमर सी वसुंधरा, रस आनन्दित विभोर हुई ।। सरस रस की कोख में द्रवित, हे सरल सहज सी चेतना । नित पल नवश्रृंगार कर, नवयौवना का रूप धर जीवन को आकर्षित करे।। रह विशाल समुद्र की कोख में, रस सागर को भी कोख धरे । कहीं झरते प्रेमरस प्रपात, और कहीं निश्छल बहती प्रेम नद्य।। प्रेमोद्दत्त हो चूमने को आतुर रसगगन को, पर्वतों के रूप लिये । धरा तेरा यह ऊर्जित प्रेम, शौर्य को भी न डिगने दे,नित्यानंद रूप में वो भी।। कहीं कलकल करतीं गातीं नदियां और कहीं कलरव का गान। पुष्प अर्पित कर प्रेमी को कर देती अपने निश्छल प्रेम का बखान।। रस सागर का अनमोल महल यह, अमर प्रेम की सहज गाथा ये। जीवन को दोनों मिलकर देते अमरत्व ये, नवयौवना प्रकृति और शौर्य।। हे वसुंधरा के पूतों न करो अपराध, इसका स्वामी बन, यह है दिव्यागंना । दिव्य ज्योति का आलिंगन ही, हे समर्थ धारण करने को इसको।। जीवन भी मात्र एक श्रृंगार है धरा का, बरसाता जो दिव्य प्रेम गगन। क्षणिक कल्पना सी चिंगारी, क्यों स्वामी वन धरा के महापराध करते हो ।। दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा,

प्राप्ति

तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के निर्झर झरे नयनों से, शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले, मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठा जब थका, रुका । -सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 

जब तक जाना खुद को ...

जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी. वक़्त  कैसे  फ़िसला  हाथ  से, सुइया  तो अबभी  वहीँ  थमी  थी. समझ  के  जिसको  अपना  इठला  रहा  था, वो  तो  कहीं  और  खड़ी  थी. जिसे  समझा  मैने  दूर अपने से, वो  तो  मुझसे  ही  जुडी  थी. समझा  देर  से, कोई  बात  नहीं; लेकिन  देर  बहुत  हो  चली  थी. जब  तक जाना  खुद   को, मौत सामने खड़ी  थी  जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी.

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है. पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा बेपर वो शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है. अपनी नज़र से ख़ुद को देखूं तो मान भी लूं आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है. हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत रिश्वत का दौर अब भी उनको चला रहा है. बुझता चिराग़ दिल में, किसने ये जान डाली फिर से हवा के रुख़ पे ये झिलमिला रहा है. पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी कुछ नाम देके आदम उलझन बढ़ा रहा है. बरसों की वो इमारत, अब हो गयी पुरानी कुछ रंग-रौगनों से उसको सज़ा रहा है. देवी नांगरानी

इतने ऊँचे उठो

       इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥ नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो नये राग को नूतन स्वर दो भाषा को नूतन अक्षर दो युग की नयी मूर्ति-रचना में इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥ लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन गति, जीवन का सत्य चिरन्तन धारा के शाश्वत प्रवाह में इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है। चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे सब हैं प्रतिपल साथ हमारे दो कुरूप को रूप सलोना इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥                                                                                     --- द्वारिका प

सब उन्नति का मूल कारण

    निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय । निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय । इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग । और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात । तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय । विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार । भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात । सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय । - भारतेंदु हरिश्चंद्र [ आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह ]   ========================================================================= हिन्दी में ब्लागिंग
लो याद आगई वो पहली कविता जो हमने बचपन मे पढी थी, याद आई आप को ................... " उ ठो लाल अब आंखें खोलो पानी लायी मुह धो लो बीती रात कमल दल फुले जिनके ऊपर भावारे झूले चिङिया चहक उठी पेडो पर बहने लगी हवा सुंदर नभ में न्यारी लाली छाई धरती ने प्यारी छवि पायी ऐसा सुन्दर समय न खो मेरे प्यारे अब मत सो " अरे अब तो जागो...................