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चांद का कुर्ता | Chaand Ka Kurta

चांद का कुर्ता  हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला, "सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला। सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं। आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का, न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का। "बच्चे की सुन बात कहा माता ने, " अरे सलोने,कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने। जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं, एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं। कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा। घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है, नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है। अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें, सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।" -रामधारी सिंह दिनकर
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही जज़्बात में वो पहले-सी शिद्दत नहीं रही सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा दिल पर वो धड़कनों की हुक़ूमत नहीं रही पैहम तवाफ़े-कूचा-ए-जानाँ के दिन गए पैरों में चलने-फिरने की ताक़त नहीं रही चेहरे की झुर्रियों ने भयानक बना दिया आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही कमज़ोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया जलवों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रही अल्लाह जाने मौत कहाँ मर गई 'ख़ुमार' अब मुझको ज़िन्दगी की ज़रूरत नहीं रही -ख़ुमार बाराबंकवी

huki Jhuki Si Nazar Beqarar Hai Ki Nahi | झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं --कैफ़ी आज़मी

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो | kar chale hum fida

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं सर हिमालय का हमने न झुकने दिया मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने के रुत रोज़ आती नहीं हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं आज धरती बनी है दुलहन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो राह कुर्बानियों की न वीरान हो तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले फतह का जश्न इस जश्न‍ के बाद है ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर इस तरफ आने पाए न रावण कोई तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे छू न पाए सीता का दामन कोई राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो - कैफ़ी आज़मी

माँ

(Author-प्रेमचंद) आज बन्दी छूटकर घर आ रहा है। करुणा ने एक दिन पहले ही घर लीप-पोत रखा था। इन तीन वर्षो में उसने कठिन तपस्या करके जो दस-पॉँच रूपये जमा कर रखे थे, वह सब पति के सत्कार और स्वागत की तैयारियों में खर्च कर दिए। पति के लिए धोतियों का नया जोड़ा लाई थी, नए कुरते बनवाए थे, बच्चे के लिए नए कोट और टोपी की आयोजना की थी। बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर प्रसन्न होती। अगर इस बच्चे ने सूर्य की भॉँति उदय होकर उसके अंधेरे जीवन को प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अन्त कर दिया होता। पति के कारावास-दण्ड के तीन ही महीने बाद इस बालक का जन्म हुआ। उसी का मुँह देख-देखकर करूणा ने यह तीन साल काट दिए थे। वह सोचती—जब मैं बालक को उनके सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जाऍंगे, फिर गोद में उठा लेंगे और कहेंगे—करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया। कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जाऍंगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक दृष्टि दृदय की सारी व्यवस्थाओं को धो डालेगी। इस कल्पना का आन्नद लेकर वह फूली न समाती थी। वह सोच

प्राप्ति

तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के निर्झर झरे नयनों से, शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले, मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठा जब थका, रुका । -सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी? देव मेरे भाग्य में क्या है बदा, मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में? या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी, चू पडूँगी या कमल के फूल में? बह गयी उस काल एक ऐसी हवा वह समुन्दर ओर आई अनमनी एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला वह उसी में जा पड़ी मोती बनी लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें बूँद लौं कुछ और ही देता है कर अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,