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एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो ।

बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले ।

चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुन्दर ।

नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई ।

भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया ।

ऐसा सुन्दर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ ।


-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
जन्म: 15 अप्रैल 1865
निधन: 16 मार्च 1947

उपनाम : हरिऔध
जन्म स्थान : निज़ामाबाद, आज़मगढ़
कुछ प्रमुख कृतियाँ: प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास, रस कलश, प्रेमाम्बु प्रवाह, चौखे चौपदे, चुभते चौपदे
विविध :अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध को खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्यकार माना जाता है।