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निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

मातृ-भाषा के प्रति
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।। उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।। निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।। इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।। और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।। तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।। सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

-भारतेंदु हरिश्चंद्र

नींद आती ही नहीं

नींद आती ही नहींनींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़ दिल के साज से दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अन्दाज़ से हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से सैकड़ों मुरदे जिलाए ओ मसीहा नाज़ से मौत शरमिन्दा हुई क्या क्या तेरे ऐजाज़ से बाग़वां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर अब खुलें पर भी तो मैं वाक़िफ नहीं परवाज़ से कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का खौफ़ वाज़ आए ए मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से बाए गफ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से नाज़े माशूकाना से खाली नहीं है कोई बात मेरे लाश को उठाए हैं वे किस अन्दाज़ से कब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका ‘रसा’ चौंकने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ सेभारतेंदु हरिश्वंद्र

सब उन्नति का मूल कारण

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
- भारतेंदु हरिश्चंद्र [आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह]=========================================================================हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 1 से …