सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नींद आती ही नहीं

नींद आती ही नहीं

नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से

तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़ दिल के साज से

दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अन्दाज़ से

हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से

सैकड़ों मुरदे जिलाए ओ मसीहा नाज़ से

मौत शरमिन्दा हुई क्या क्या तेरे ऐजाज़ से

बाग़वां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर

अब खुलें पर भी तो मैं वाक़िफ नहीं परवाज़ से

कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का खौफ़

वाज़ आए ए मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से

बाए गफ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो

चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से

नाज़े माशूकाना से खाली नहीं है कोई बात

मेरे लाश को उठाए हैं वे किस अन्दाज़ से

कब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका ‘रसा’

चौंकने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ से

भारतेंदु हरिश्वंद्र

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिन्दी की किताबे | Read hindi stories online

Image via Wikipedia हिन्दी की किताबे पुरानी पोस्ट : क्लिक करें हिन्दी की किताबे माँ - कहानी (प्रेमचंद) ईदगाह - कहानी (प्रेमचंद) अलग्योझा - कहानी (प्रेमचंद) इस्तीफा - कहानी (प्रेमचंद) कप्तान साहब -कहानी (प्रेमचंद) प्रायश्चित - कहानी (प्रेमचंद) बैंक का दिवाला - कहानी (प्रेमचंद) शान्ति - कहानी (प्रेमचंद) समर-यात्रा - कहानी (प्रेमचंद) मैकू - कहानी (प्रेमचंद) झाँकी - कहानी (प्रेमचंद) पूस की रात -कहानी (प्रेमचंद) ठाकुर का कुआँ -कहानी (प्रेमचंद) स्वामिनी - कहानी (प्रेमचंद) नाग-पूजा -कहानी (प्रेमचंद) शंखनाद - कहानी (प्रेमचंद) दुर्गा का मन्दिर - कहानी (प्रेमचंद) आत्माराम - कहानी (प्रेमचंद) पंच परमेश्वर - कहानी (प्रेमचंद) बड़े घर की बेटी - कहानी (प्रेमचंद) चतुर नाई (बाल-कहानी) रत्ना भाई (बाल-कहानी) कंजूस सेठ (कहानी) मुर्ख बहु (बाल-कहानी) आनंदी कौआ (बाल-कहानी) मुर्ख कौआ (बाल-कहानी) तिवारी जी (कहानी) नकलची नाई (कहानी) करामाती तुम्बी (बाल-कहानी) बोहरा और बोहरी (बाल-कहानी) चतुर खरगोश - बाल-कहानी कुनबी और कुनबिन- कहानी चोर और राजा (कहानी) कौआ और मैना (बाल-कहानी) गिलहरीबाई (बाल-कहानी

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र प्रतापनारायण मिश्र (सितंबर, 1856 - जुलाई, 1894) भारतेंन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। पंडित जी का जन्म उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव निवासी, कात्यायन गोत्रीय, कान्यकुब्ज ब्राहृमण पं. संकटादीन के घर आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था।वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रतिभारतेंदु" अथवा "द्वितीयचंद्र" कहे जाने लगे थे। बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे और अक्षरारंभ के पश्चात् उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे। किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अँगरेजी मदरसे में भरती करा दिया। तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष

कुछ छंद ओरकुट से

तो पेश-ए-खिदमत है , कुछ चुने हुए पद्य , ओरकुट से १ रहो जमीं पे मगर आसमां का ख्वाब रखो तुम अपनी सोच को हर वक्त लाजवाब रखो खड़े न हो सको इतना न सर झुकाओ कभी उभर रहा जो सूरज तो धूप निकलेगी उजालों में रहो, मत धुंध का हिसाब रखो मिले तो ऐसे कि कोई न भूल पाये तुम्हें महक वंफा की रखो और बेहिसाब रखो अक्लमंदों में रहो तो अक्लमंदों की तरह और नादानों में रहना हो रहो नादान से वो जो कल था और अपना भी नहीं था, दोस्तों आज को लेकिन सजा लो एक नयी पहचान से २ खामोशी का मतलब इन्कार नही होता.. नाकामयाबी का मतलब हार नही होता.. क्या हुआ अगर हम उन्हे पा ना सके.. सिर्फ पा लेने का मतलब प्यार नही होता... चाहने से कोई बात नही होती.... थोडे से अंधेरे से रात नही होती.. जिन्हे चाहते है जान से ज्यादा.. उन्ही से आज कल मुलाकात भी नही होती... ३ कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं कई सदियों में आती है कोई सूरत हसीं इतनी हुस्न पर हर रोज कहां ऐसे श़बाब आते हैं रौशनी के वास्ते तो उनका नूर ही काफ