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सद्विचार इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं-एक दुःख और दूसरा श्रम । दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता । ज्ञान का अर्थ है-जानने की शक्ति । झूठ को सच से पृथक् करने वाली जो विवेक बुद्धि है-उसी का नाम ज्ञान है । अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूती से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है । आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है । कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं । बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फलेगा-फूलेगा । जो दूसरों को धोखा देना चाहता है, वास्तव में वह अपने आपको ही धोखा देता है । समर्पण का अर्थ है-पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना । मनोविकार भले ही छोटे हों या
"उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है, सुख नहीं धर्म भी नहीं न तो दर्शन है, विज्ञान ज्ञान बल नही न तो चिंतन है, जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है." रामधारी सिंह दिनकर

इश्क़ में इम्तेहान

  वैसे तो आपकी हर अदा से वाकिफ़ है दिलदारा     डरते है जब इश्क़ में इम्तेहान  देने की बात हो | From http://mehhekk.wordpress.com/

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा हम बुलबुलें है इस की, यह गुलसितां हमारा घुर्बत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में समझो वहीं हमें भी, दिल हैं जहाँ हमारा परबत वोह सब से ऊँचा, हमसाया आसमान का वोह संतरी हमारा, वोह पस्बन हमारा गोदी में खेलती हैं इस की हजारों नदिया गुलशन है जिन के दम से, रश्क-ऐ-जनन हमारा आये अब, रूद, गंगा, वोह दिन हें यद् तुझको उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा मज़हब नहीं सिखाता आपस में बयर रखना हिन्दवी है हम, वतन है हिन्दोस्तान हमारा यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा, सब मिट गए जहाँ से अब तक मगर है बाकी, नम-ओ-निशान हमारा कुछ बात है कह हस्ती, miṭati नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ऐ-ज़मान हमारा इकबाल कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में मालूम क्या किसी को, दर्द-ऐ-निहां हमारा --- इकबाल

आज होली है

~भारतेंदु हरिश्चंद्र~ गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में । बुझे दिल की लगी भी तो ए याए होली में ।। नहीं यह है गुलाले सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे, य आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में । गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो, मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में । है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुच है, बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में । रसा गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी, नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में । ~जयशंकर प्रसाद~ बरसते हो तारों के फूल छिपे तुम नील पटी में कौन? उड़ रही है सौरभ की धूल कोकिला कैसे रहती मीन। चाँदनी धुली हुई हैं आज बिछलते है तितली के पंख। सम्हलकर, मिलकर बजते साज मधुर उठती हैं तान असंख। तरल हीरक लहराता शान्त सरल आशा-सा पूरित ताल। सिताबी छिड़क रहा विधु कान्त बिछा हैं सेज कमलिनी जाल। पिये, गाते मनमाने गीत टोलियों मधुपों की अविराम। चली आती, कर रहीं अभीत कुमुद पर बरजोरी विश्राम। उड़ा दो मत गुलाल-सी हाय अरे अभिलाषाओं की धूल। और ही रंग नही लग लाय मधुर मंजरियाँ जावें झूल। विश्व में ऐसा शीतल खेल हृदय में जलन रहे, क्या

होली

~~ सूरदास ~~ हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग , कसि कंचुकी , काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी , सुनि माधो के बैन।। डफ , बांसुरी , रुंज अरु महुआरि , बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब , एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर , अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं , गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट , देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि , भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन , आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन , सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले , निरखत स्याम बिनोद ~~ मीराबाई ~~ रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री। होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी , री।। उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल। पिच काँ उडावां रंग रंग री झरी , री।। चोवा चन्दण अरगजा म्हा , केसर णो गागर भरी री। मीरां दासी गिरधर नागर , चेरी चरण धरी री।।