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उधो मनकी मनमें रही

उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥ गोकुलते जब मथुरा पधारे । कुंजन आग देही ॥१॥ पतित अक्रूर कहासे आये । दुखमें दाग देही ॥२॥ तन तालाभरना रही उधो । जल बल भस्म भई ॥३॥ हमरी आख्या भर भर आवे । उलटी गंगा बही ॥४॥ सूरदास प्रभु तुमारे मिलन । जो कछु भई सो भई ॥५॥

होली

~~ सूरदास ~~ हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग , कसि कंचुकी , काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी , सुनि माधो के बैन।। डफ , बांसुरी , रुंज अरु महुआरि , बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब , एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर , अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं , गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट , देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि , भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन , आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन , सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले , निरखत स्याम बिनोद ~~ मीराबाई ~~ रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री। होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी , री।। उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल। पिच काँ उडावां रंग रंग री झरी , री।। चोवा चन्दण अरगजा म्हा , केसर णो गागर भरी री। मीरां दासी गिरधर नागर , चेरी चरण धरी री।।

मैया मैं नहीं माखन खायौ

~1~ मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥ ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥ देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥ हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥ मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥ डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥ बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥ सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥ ~2~ मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥ तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी । काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी ॥ काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी । सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी ॥