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उधो मनकी मनमें रही

उधोमनकीमनमेंरही॥ध्रु०॥
गोकुलतेजबमथुरापधारे।कुंजनआगदेही॥१॥
पतितअक्रूरकहासेआये।दुखमेंदाग

होली

~~सूरदास~~

हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग,कसि कंचुकी,काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी,सुनि माधो के बैन।।
डफ,बांसुरी,रुंज अरु महुआरि,बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविन्द ग्वाल सब,एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर,अपनी भाई गारि।।
मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं,गहि लावतिं अचकाई।
भरि अरगजा अबीर कनक घट,देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि,भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन,आये हैं मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयो परिपूरन,सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले,निरखत स्याम बिनोद


~~मीराबाई~~
रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी,री।।
उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँउडावां रंग रंग री झरी,री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा,केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर,चेरी चरण धरी री।।

मैया मैं नहीं माखन खायौ

~1~मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥
बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥ ~2~मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी ।
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी ॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी ।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी ॥