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आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं देस ही की याद है बस गत मुझे दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे अकबर इलाहाबादी रोज़े-रिन्दी = शराब पीने का दिन नसीबे-दीगराँ = दूसरों की क़िस्मत में क़ूवत = ताक़त

इश्क़ की दास्तान है प्यारे

इश्क़ की दास्तान है प्यारे इश्क़ की दास्तान है प्यारे अपनी-अपनी ज़ुबान है प्यारे हम ज़माने से इंतक़ाम तो लें एक हसीं दर्मियान है प्यारे तू नहीं मैं हूं मैं नहीं तू है अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे रख क़दम फूँक-फूँक कर नादान ज़र्रे-ज़र्रे में जान है प्यारे जिगर मुरादाबादी

इश्क़ में इम्तेहान

  वैसे तो आपकी हर अदा से वाकिफ़ है दिलदारा     डरते है जब इश्क़ में इम्तेहान  देने की बात हो | From http://mehhekk.wordpress.com/