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होली

~~ सूरदास ~~ हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग , कसि कंचुकी , काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी , सुनि माधो के बैन।। डफ , बांसुरी , रुंज अरु महुआरि , बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब , एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर , अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं , गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट , देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि , भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन , आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन , सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले , निरखत स्याम बिनोद ~~ मीराबाई ~~ रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री। होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी , री।। उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल। पिच काँ उडावां रंग रंग री झरी , री।। चोवा चन्दण अरगजा म्हा , केसर णो गागर भरी री। मीरां दासी गिरधर नागर , चेरी चरण धरी री।।