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होली है

होली है

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का 'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का गर शैख़ो-बहरमन सुनें अफ़साना किसी का माबद न रहे काब-ओ-बुतख़ाना किसी का अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चाँद-सी सूरत रौशन भी करो जाके सियहख़ाना किसी का अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का इशरत जो नहीं आती मिरे दिल में, न आए हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का करने जो नहीं देते बयाँ हालते-दिल को सुनिएगा लबे-गोर से अफ़साना किसी का कोई न हुआ रूह का साथी दमे-आखि़र काम आया न इस वक्त़ में याराना किसी का हम जान से बेज़ार रहा करते हैं 'अकबर' जब से दिले-बेताब है दीवाना किसी का अकबर इलाहाबादी

यादें थी कि आज भी उतनी हसीं

एक वक्त था जब वक्त कटता नही था उ नकी याद आने के बाद एक वक्त है आज , जब वक्त कट जाता है उनकी याद आने के बाद ता उम्र कोशिश रही भूल जाऊँ उसे वक्त के फासले भी न मिटा सके उसकी याद उ स के चले जाने के बाद वक्त और यादें कुछ ऐसी डोर से बंधे कि जैसे जैसे भूलने की कोशिश की वक्त कटता ही चला गया इस नादान हरकत मे यादें और जवान होती रही ता उम्र ये कोशिश जारी रही यादें थी कि आज भी उतनी हसीं थी

दिन बसन्त के

दिन बसन्त के राजा-रानी-से तुम दिन बसन्त के आए हो हिम के दिन बीतते दिन बसन्त के पात पुराने पीले झरते हैं झर-झर कर नई कोंपलों ने शृंगार किया है जी भर फूल चन्द्रमा का झुक आया है धरती पर अभी-अभी देखा मैंने वन को हर्ष भर कलियाँ लेते फलते, फूलते झुक-झुककर लहरों पर झूमते आए हो हिम के दिन बीतते दिन बसन्त के ----  ठाकुरप्रसाद सिंह

यह दीप अकेला स्नेह भरा

यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इसको भी पंक्ति को दे दो यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा? यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इस को भी पंक्ति दे दो यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः इस को भी शक्ति को दे दो यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इस को भी पंक्ति दे दो यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा, वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इस को भक्ति को दे दो यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इस को भी पंक्ति दे दो ------अज्ञेय

अमीर खुसरो

  छाप-तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिला के । प्रेम बटी का मदवा पिला के, मतबारी कर दीन्हीं रे मोंसे नैना मिला के । खुसरो निज़ाम पै बलि-बलि जइए मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिला के ।   `2` जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर । जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर । तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिली तुम आय कर । जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ तेरी जो चिंता दिल धरूँ, एक दिन मिलो तुम आय कर । मेरी जो मन तुम ने लिया, तुम उठा गम को दिया तुमने मुझे ऐसा किया, जैसा पतंगा आग पर । खुसरो कहै बातों ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर ।     अमीर खुसरो

चिट्ठाजगत Tags: ब्रज मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥