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दिन बसन्त के

दिन बसन्त के राजा-रानी-से तुम दिन बसन्त के आए हो हिम के दिन बीतते दिन बसन्त के पात पुराने पीले झरते हैं झर-झर कर नई कोंपलों ने शृंगार किया है जी भर फूल चन्द्रमा का झुक आया है धरती पर अभी-अभी देखा मैंने वन को हर्ष भर कलियाँ लेते फलते, फूलते झुक-झुककर लहरों पर झूमते आए हो हिम के दिन बीतते दिन बसन्त के ----  ठाकुरप्रसाद सिंह

सखि, वसन्त आया

सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।                                               सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

वीणावादिनि वर दे

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।वर दे, वीणावादिनि वर दे। सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

बसंत पंचमी

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ऋतुराज वसंत का आगमन होचुका है ।   और आज बसंत पंचमी है --- बसंत पर्व का प्रथम दिवस । इसी दिन श्री यानी विद्या की अधिष्ठात्री, ज्ञान की देवी माँ सरस्वती प्राक्ट्योत्सव मनाया जाता है।  इसी दिन सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर जाता है। हर ओर पेड़-पौधे अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से आच्छादित दिखाई देते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध से भर उठता है । चारो और वसंत के आगमन की सूचना बटाते हुए भौरे गुंजन करते है। इसी दिवस को माँ शारदा की वंदना की जाती है ज्ञान प्राप्ति के लिए
सरस्वती वंदना~१~सरस्वती तु 'धी' देवी च प्रजापतिः । 'ऐं' बीजं कश्यपश्चषिर्यर्न्त्रं चाऽपि सरस्वती॥ कथितान्यस्य भूती तु हषार् च प्रभवा पुनः । कलात्मता स उल्लासो द्वयं प्रतिफलं मतम्॥~२~या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्तावृता
या वीणावरदंडमंडितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभितिभिर्देवैःसदावंदिता
सामांपातु सरस्वतीभगवती निःशेषजाड्यापहा  ।।शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद…