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ई-शब्दावली

शब्दावली या शब्दकोष का किसी भी भाषा के सीखने समझने में बड़ा योगदान रहा है. आज इस पोस्ट में कुछ ऐसेही शब्दकोष का जिक्र किया गया है https://hi.wiktionary.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%80:%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B6 English-Hindi Glossary रसायन वि‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह जीव विज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह डाउनलोड हिन्दी फोन्ट http://www.wazu.jp/gallery/Fonts_Devanagari.html http://www.ffonts.net/Hindi.html http://devanaagarii.net/fonts/ डाउनलोड यूनिकोड हिन्दी फोन्ट http://salrc.uchicago.edu/resources/fonts/available/hindi/ http://www.alanwood.net/unicode/fonts.html#devanagari माईक्रोसॉफ्ट भाषा इण्डिया http://www.bh

हिन्दी साहित्य का इतिहास - 03

हिन्दी का उद्भव  (केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय) हिन्दी साहित्य का इतिहास  (गूगल पुस्तक ; लेखक - श्याम चन्द्र कपूर) आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास  (गूगल पुस्तक; लेखक - बच्चन सिंह) हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास  (गूगल पुस्तक ; लेखक - बच्चन सिंह) हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास (प्रथम खण्ड)  (गूगल पुस्तक ; लेखक - गोपीचन्द्र गुप्त) हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, खण्ड-२  (गूगल पुस्तक ; लेखक - गोपीचन्द्र गुप्त) हिन्दी साहित्य का इतिहास (हिन्दीकुंज में) साहित्य-इतिहास लेखन की परंपरा और आचार्य द्विवेदी की आलोचना के लोचन  (मधुमती) हिन्दी साहित्य का इतिहास-पुनर्लेखन की समस्याएँ  (डॉ. चंद्रकुमार जैन) हिन्दी का प्रथम आत्मचरित्  अर्द्ध-कथानक  - एक अनुशीलन History of the Hindi Language  (हिन्दी सोसायटी, सिंगापुर) हिन्दी साहित्य का इतिहास  (गूगल पुस्तक ; लेखक - श्यामसुन्दर कपूर) हिन्दी साहित्य प्रश्नोत्तरी  (गूगल पुस्तक) रहस्यवादी जैन अपभ्रंश काव्य का हिन्दी पर प्रभाव  (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रेमचन्द्र जैन) भारत के प्राचीन भाषा-परिवार और हिन्दी  (गूगल पुस्तक ; लेखक - रामविलास

हिन्दी साहित्य का इतिहास - 02

हिन्दी साहित्य का इतिहास ७५० ईसा पूर्व - संस्कृत का वैदिक संस्कृत के बाद का क्रमबद्ध विकास। ५०० ईसा पूर्व - बौद्ध तथा जैन की भाषा प्राकृत का विकास (पूर्वी भारत)। ४०० ईसा पूर्व - पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण लिखा (पश्चिमी भारत)। वैदिक संस्कृत से पाणिनि की काव्य संस्कृत का मानकीकरण। संस्कृत का उद्गम ३२२ ईसा पूर्व - मौर्यों द्वारा ब्राह्मी लिपि का विकास। २५० ईसा पूर्व - आदि संस्कृत का विकास। (आदि संस्कृत ने धीरे धीरे १०० ईसा पूर्व तक प्राकति का स्थान लिया।) ३२० ए. डी. (ईसवी)- गुप्त या सिद्ध मात्रिका लिपि का विकास। अपभ्रंश तथा आदि-हिन्दी का विकास ४०० - कालीदास ने "विक्रमोर्वशीयम्" अपभ्रंश में लिखी। ५५० - वल्लभी के दर्शन में अपभ्रंश का प्रयोग। ७६९ - सिद्ध सरहपद (जिन्हें हिन्दी का पहला कवि मानते हैं) ने "दोहाकोश" लिखी। ७७९ - उदयोतन सुरी कि "कुवलयमल" में अपभ्रंश का प्रयोग। ८०० - संस्कृत में बहुत सी रचनायें लिखी गईं। ९९३ - देवसेन की "शवकचर" (शायद हिन्दी की पहली पुस्तक)। ११०० - आधुनिक देवनागरी लिपि का प्रथम स्वरूप। ११४५-१२२९ - हेमचंद्राचा

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था वो के ख़ुश-बू की तरह फैला था चार सू मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा सारी दुनिया में मगर कोई तेरे जैसा न था ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं आँख धुँधलाई हुई थी शहर धुंदलाया न था सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब एक पत्थर था ख़ेमोशी का के जो हटता न था याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी 'अदीम' भूल जाने के सिवा अब कोई भे चारा न था मस्लेहत ने अजनबी हम को बनाया था 'अदीम' वरना कब इक दूसरे को हम ने पहचाना न था -- अदीम हाशमी

अधिकार | Adhikar by Mahadevi Verma

वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना; वे नीलम के मेघ, नहीं जिनको है घुल जाने की चाह वह अनन्त रितुराज,नहीं जिसने देखी जाने की राह| वे सूने से नयन,नहीं जिनमें बनते आँसू मोती, वह प्राणों की सेज,नही जिसमें बेसुध पीड़ा सोती; ऐसा तेरा लोक, वेदना नहीं,नहीं जिसमें अवसाद, जलना जाना नहीं, नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद! क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुणा का उपहार? रहने दो हे देव! अरे यह मेरा मिटने का अधिकार! अधिकार / महादेवी वर्मा

हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध रचनायें

हिन्दी साहित्य के इतिहासकार और उनके ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के मुख्य इतिहासकार और उनके ग्रन्थ निम्नानुसार हैं - 1. गार्सा द तासी : इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी (फ्रेंच भाषा में; फ्रेंच विद्वान, हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार) 2. शिवसिंह सेंगर : शिव सिंह सरोज 3. जार्ज ग्रियर्सन : द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर आफ हिंदोस्तान 4. मिश्र बंधु : मिश्र बंधु विनोद 5. रामचंद्र शुक्ल : हिंदी साहित्य का इतिहास 6. हजारी प्रसाद द्विवेदी : हिन्दी साहित्य की भूमिका; हिन्दी साहित्य का आदिकाल; हिन्दी साहित्य :उद्भव और विकास 7. रामकुमार वर्मा : हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास 8. डॉ धीरेन्द्र वर्मा : हिन्दी साहित्य 9. डॉ नगेन्द्र : हिन्दी साहित्य का इतिहास; हिन्दी वांड्मय 20वीं शती 10. रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986 11. बच्चन सिंह : हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली 12. डा० मोहन अवस्थी  : हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास 13. बाबू गुलाब राय : हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास

दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा

नवयौवना का सा श्रृंगार प्रकृति, नव निश्छल बहता जा प्रेम पथिक । धरा अजर अमर सी वसुंधरा, रस आनन्दित विभोर हुई ।। सरस रस की कोख में द्रवित, हे सरल सहज सी चेतना । नित पल नवश्रृंगार कर, नवयौवना का रूप धर जीवन को आकर्षित करे।। रह विशाल समुद्र की कोख में, रस सागर को भी कोख धरे । कहीं झरते प्रेमरस प्रपात, और कहीं निश्छल बहती प्रेम नद्य।। प्रेमोद्दत्त हो चूमने को आतुर रसगगन को, पर्वतों के रूप लिये । धरा तेरा यह ऊर्जित प्रेम, शौर्य को भी न डिगने दे,नित्यानंद रूप में वो भी।। कहीं कलकल करतीं गातीं नदियां और कहीं कलरव का गान। पुष्प अर्पित कर प्रेमी को कर देती अपने निश्छल प्रेम का बखान।। रस सागर का अनमोल महल यह, अमर प्रेम की सहज गाथा ये। जीवन को दोनों मिलकर देते अमरत्व ये, नवयौवना प्रकृति और शौर्य।। हे वसुंधरा के पूतों न करो अपराध, इसका स्वामी बन, यह है दिव्यागंना । दिव्य ज्योति का आलिंगन ही, हे समर्थ धारण करने को इसको।। जीवन भी मात्र एक श्रृंगार है धरा का, बरसाता जो दिव्य प्रेम गगन। क्षणिक कल्पना सी चिंगारी, क्यों स्वामी वन धरा के महापराध करते हो ।। दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा,