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फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था वो के ख़ुश-बू की तरह फैला था चार सू मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा सारी दुनिया में मगर कोई तेरे जैसा न था ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं आँख धुँधलाई हुई थी शहर धुंदलाया न था सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब एक पत्थर था ख़ेमोशी का के जो हटता न था याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी 'अदीम' भूल जाने के सिवा अब कोई भे चारा न था मस्लेहत ने अजनबी हम को बनाया था 'अदीम' वरना कब इक दूसरे को हम ने पहचाना न था -- अदीम हाशमी