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प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

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प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!
दुख से आविल सुख से पंकिल,
बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल,
बहता है युग-युग अधीर!

जीवन-पथ का दुर्गमतम तल
अपनी गति से कर सजल सरल,
शीतल करता युग तृषित तीर!

इसमें उपजा यह नीरज सित,
कोमल कोमल लज्जित मीलित;
सौरभ सी लेकर मधुर पीर!

इसमें न पंक का चिन्ह शेष,
इसमें न ठहरता सलिल-लेश,
इसको न जगाती मधुप-भीर!

तेरे करुणा-कण से विलसित,
हो तेरी चितवन में विकसित,
छू तेरी श्वासों का समीर!


---- महादेवी वर्मा

अग्निरेखा (टकरायेगा नहीं)

टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से, कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?
अब तक धरती अचल रही पैरों के नीचे, फूलों की दे ओट सुरभि के घेरे खींचे, पर पहुँचेगा पथी दूसरे तट पर उस दिन जब चरणों के नीचे सागर लहरायेगा ! कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?
गर्त शिखर वन, उठे लिए भंवरों का मेला, हुए पिघल ज्योतिष्क तिमिर की निश्चल वेला, तू मोती के द्वीप स्वप्न में रहा खोजता, तब तो बहता समय शिला सा जम जायेगा । कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?
तेरी लौ से दीप्त देव-प्रतिमा की आँखें, किरणें बनी पुजारी के हित वर की पांखें, वज्र-शिला पर गढ़ी ध्वंस की रेखायें क्या यह अंगारक हास नहीं पिघला पायेगा ? कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?
धूल पोंछ कांटे मत गिन छाले मत सहला, मत ठण्डे संकल्प आँसुयों से तू नहला, तुझसे हो यदि अग्नि-स्नात यह प्रलय महोत्सव तभी मरण का स्वस्ति-गान जीवन गायेगा । कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुँचायेगा ?
टकरायेगा नहीं आज उद्धत लहरों से कौन ज्वार फिर तुझे दिवस तक पहुँचायेगा ?
------------- अग्निरेखा  महादेवी वर्मा

हिन्दी की उत्कृष्ट रचनाएँ | जो तुम आ जाते एक बार | Jo Tum AA Jate Ek Bar

विरहपूर्ण गीतों की गायिका महादेवी वर्मा आधुनिक युग की मीरा कही जाती है।

हादेवी वर्मा (२६ मार्च १९०७ — ११ सितंबर १९८७) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी ... महादेवी वर्मा के मानस बंधुओं में सुमित्रानंदन पंत एवं निराला का नाम लिया जा सकता है, जो उनसे जीवन पर्यन्त राखी बँधवाते रहे।



जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

अधिकार | Adhikar by Mahadevi Verma

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वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना;

वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नहीं
जिसने देखी जाने की राह|

वे सूने से नयन,नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;

ऐसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार?
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरा मिटने का अधिकार!

अधिकार / महादेवी वर्मा

मां के ठाकुर जी भोले हैं

ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हें लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं।

-- महादेवी वर्मा

जब यह दीप थके

छायावादीयुगकी प्रमुख स्तंभ तथाआधुनिकमीराकेनामसेजानेजानीवालीकवियत्रीद्वारारचित जब यह दीप थके
जब यह दीप थके
जब यह दीप थके तब आना।
यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना!
साधें करुणा-अंक ढली है, सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर पावस की सजला बदली है; विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!
यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है, सुधि से सुरभित स्नेह-धुले, ज्वाला के चुम्बन से निखरे है; दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!
यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के चिर उज्जवल अक्षर जीवन की बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के; कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!
लौ ने वर्ती को जाना है वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने रज का अंचल पहचाना है; चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!

-----महादेवी वर्माप्रमुखकाव्यसंग्रह
दीपशिखा , प्रथम आयाम , नीहार , रश्मि , नीरजा , सांध्यगीत , अग्निरेखा , दीपगीत , नीलाम्बरा , आत्मिका