#1

दिव्य प्रेम की यह अमरगाथा

नवंबर 14, 2015 ・0 comments
नवयौवना का सा श्रृंगार प्रकृति, नव निश्छल बहता जा प्रेम पथिक । धरा अजर अमर सी वसुंधरा, रस आनन्दित विभोर हुई ।। सरस रस की कोख में द्रवित,...
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#2

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है

फ़रवरी 17, 2008 ・0 comments
कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है. पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा बेपर वो शोख़ियों मे...
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#3

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

फ़रवरी 17, 2008 ・0 comments
दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था. जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं छोटे से एक घर...
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#4

जब यह दीप थके

फ़रवरी 05, 2008 ・1 comments
छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ तथा आधुनिक मीरा के नाम से जाने जानी वाली कवियत्री द्वारा रचित जब यह दीप थके जब यह दीप थके ज...
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