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संदेश

मां के ठाकुर जी भोले हैं

ठंडे पानी से नहलाती ठंडा चन्दन उन्हें लगाती उनका भोग हमें दे जाती तब भी कभी न बोले हैं मां के ठाकुर जी भोले हैं। -- महादेवी वर्मा

चेतक की वीरता | chetak ki veerata

रणबीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग ----------- श्यामनारायण पाण्डेय 

वीर तुम बढ़े चलो | Veer Tum Badhe Chalo

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! -----------  द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

उपलब्धि | upalabdhi

मैं क्या जिया ? मुझको जीवन ने जिया - बूँद-बूँद कर पिया, मुझको पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया मैं क्या जला ? मुझको अग्नि ने छला - मैं कब पूरा गला, मुझको थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया देखो मुझे हाय मैं हूँ वह सूर्य जिसे भरी दोपहर में अँधियारे ने तोड़ दिया ! ----------- धर्मवीर भारती  (1926-1997)

सफलता या विफलता - Sir Walter Scott

"Success or failure is caused more by mental attitude than by mental capacity." - Sir Walter Scott सफलता या विफलता मानसिक क्षमता के द्वारा की तुलना में मानसिक दृष्टिकोण  के कारण  अधिक  होता है

जब तक जाना खुद को ...

जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी. वक़्त  कैसे  फ़िसला  हाथ  से, सुइया  तो अबभी  वहीँ  थमी  थी. समझ  के  जिसको  अपना  इठला  रहा  था, वो  तो  कहीं  और  खड़ी  थी. जिसे  समझा  मैने  दूर अपने से, वो  तो  मुझसे  ही  जुडी  थी. समझा  देर  से, कोई  बात  नहीं; लेकिन  देर  बहुत  हो  चली  थी. जब  तक जाना  खुद   को, मौत सामने खड़ी  थी  जब  तक जाना  खुद   को, देर बहुत होगई थी.

Blog jagat me प्रणय गीत

गीत प्रणय का अधर सजा दो । स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो । ये गीत लिखा है  कवि कुलवंत सिंह  बहुत ही भावनाओं से ओतप्रेत है यह गीत. कुछ और पंक्तिया  देखें :  नंदन कानन कुसुम मधुर गंध, तारक संग शशि नभ मलंद, अनुराग मृदुल शिथिल अंग, रोम रोम मद पान करा दो । गीत प्रणय का अधर सजा दो । पूरा गीत पढ़ने केलिए जाएँ :  गीत सुनहरे एक और रचना है,  तुम्हें पुकारे पिघला काजल ये नटखट सी  खूबसूरत    रचना लिखी है रत्ना जी ने,  प्रीत रीत का सूरज चमके तन मन रूह सोने सी दमके गम की सन्धया जाए बीत लौट आए जो बिछुड़ा मीत मीत से मिलने पर गम की सांझ बीत जाने की बात करते समय, प्रीत का सूरज चमकने की आशा जगती ये पंक्तिया प्रशंनीय है. और आखिर में मयंक की लिखी पंक्तिया: कोमलता अपनाने वाले, गीत प्रणय के गाते हैं। काँटों में मुस्काने वाले, सबसे ज्यादा भाते हैं।। ~~~