Posts

Showing posts from September, 2018

Archan

Image
अर्चन
किसी की महत्ता मानते हुए श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करने की क्रिया या भाव


अर्चन - पूजन, वंदन, उपासना को अर्चन कहते है. तथा वंदना या प्रार्थना को अर्चना कहते है |  

प्रातः स्मरणीय श्लोक, वन्दनाएं  तथा स्त्रोत का अध्ययन करने हेतु एक नया ब्लॉग बनाया है. आप भी अपना सहयोग दे. आपके क्षेत्र में प्रचलित दोहे, वंदना, भजन, प्रार्थनाओं को संकलित कर भेजे.

Mulla Nasruddin | मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन होजा तुर्की (और संभवतः सभी इस्लामी देशों का) सबसे प्रसिद्द विनोद चरित्र है। तुर्की भाषा में होजा शब्द का अर्थ है शिक्षक या स्कॉलर। उसकी चतुराई और वाकपटुता के किस्से संभवतः किसी वास्तविक इमाम पर आधारित हैं। कहा जाता है की उसका जन्म वर्ष १२०८ में तुर्की के होरतो नामक एक गाँव में हुआ था और वर्ष १२३७ में वह अक्सेहिर नामक मध्यकालीन नगर में बस गया जहाँ हिजरी वर्ष ६८३ (ईसवी १२८५) में उसकी मृत्यु हो गई। मुल्ला नसरुद्दीन के इर्दगिर्द लगभग ३५० कथाएँ और प्रसंग घुमते हैं जिनमें से बहुतों की सत्यता संदिग्ध है।


मुल्ला नसरूदीन कहानियों की दुनिया का एक ऐसा पात्र था, जो सूदखोरों, जबरन कर वसूल करने वालों तथा दुष्ट दरबारियों का कट्टर दुश्मन था | वह एक नेकदिल इंसान था, जो जुल्म करने वालों को अपनी बुद्धिमानी से ऐसा सबक सिखाता था की वे जिंदगी-भर नहीं भूलते थे | गरीब लागों के हक़ की लड़ाई लड़ने को वह हमेशा तैयार रहता था | दस वर्षों तक तेहरान, बगदाद और दूसरों शहरों में भटकने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन जब अपने मुल्क बुखारा लौटा तो वह फैली अव्यवस्था के कारन जालिमों से बदला लेने के लिए मैदान में कूद…

फूल थे बादल भी था

ख़्वाहिशें हैं घर से बाहर दूर जाने की बहुत शौक़ 

लेकिन दिल में वापस लौट कर आने का था 




फूल थे बादल भी था, और वो हसीं सूरत भी थी दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी
जो हवा में घर बनाया काश कोई देखता दस्त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी
कह गया मैं सामने उसके जो दिल का मुद्दआ कुछ तो मौसम भी अजब था, कुछ मेरी हिम्मत भी थी
अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई गो ज़रा से फासले पर घर की हर राहत भी थी
क्या क़यामत है 'मुनीर' अब याद भी आते नहीं वो पुराने आशना जिनसे हमें उल्फत भी थी


~मुनीर नियाज़ी

हिंदी दिवस

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था. तब से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था।
१४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष १९५३ से पूरे भारत में १४ सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।वर्ष  १९१८ में गांधी जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितम्बर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग १७ के अध्याय की धारा ३४३(१) में इस प्रकार वर्णित है:

संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

मातृ-भाषा के प्रति
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।। उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।। निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।। इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।। और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।। तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।। सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

-भारतेंदु हरिश्चंद्र

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

~~~~

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!
दुख से आविल सुख से पंकिल,
बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल,
बहता है युग-युग अधीर!

जीवन-पथ का दुर्गमतम तल
अपनी गति से कर सजल सरल,
शीतल करता युग तृषित तीर!

इसमें उपजा यह नीरज सित,
कोमल कोमल लज्जित मीलित;
सौरभ सी लेकर मधुर पीर!

इसमें न पंक का चिन्ह शेष,
इसमें न ठहरता सलिल-लेश,
इसको न जगाती मधुप-भीर!

तेरे करुणा-कण से विलसित,
हो तेरी चितवन में विकसित,
छू तेरी श्वासों का समीर!


---- महादेवी वर्मा

Jab Jab ye saavan aaya ......

जब जब ये सावन आया है।
अँखियाँ छम छम सी बरस गई। तेरी यादों की बदली से।
मेरी ऋतुएँ भी थम सी गई । घनघोर घटा सी याद तेरी ।
जो छाते ही अकुला सी गई । पपिहे सा व्याकुल मन मेरा।
और बंजर धरती सी आस मेरी। कोई और ही हैं...
जो मदमाते हैं।
सावन में 'रस' से,
भर जाते हैं । मैं तुमसे कहाँ कभी रीती हूँ ।
एक पल में सदियाँ जीती हूँ। मन आज भी मेरा तरसा है।
बस नयन मेघ ही बरसा है।। मन आज भी मेरा तरसा है।
बस नयन मेघ ही बरसा है।।

डॉ. मधूलिका मिश्रा त्रिपाठी

हिंदी पखवाड़ा

टूटे धागों को 
फिर से जोड़ते हैं 
चलो.... 
खामोशी तोड़ते हैं!!!

वसुंधरा व्यास की इन पंक्तियों के साथ आप सभी आमंत्रित है, अपने आप को अभियक्त करने केलिए....
अपनी अभिव्यक्ति -- अपनी ही भाषा में....



भाषा का प्रयोग ही भाषा  जीवन  है. हिंदी में बोलना शान है , आगे बढे और हिंदी में बोलना शुरू कीजिये। 
कितनी ही भाषाएँ आती हों मुझे, पर जो मजा हिंदी में सुनाने सुनाने में आता है, वो कहीं और नहीं।

   भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में :-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

इसमें कवि मातृभाषा का उपयोग सभी प्रकार की शिक्षा के लिए करने पर जोर देते हैं।  निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण सम्भव नहीं है।
विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान, सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये।

प्रेम की कविता

वह मेरी खिड़की के सामने
धीरे से बोली-- ‘म्याऊँ’
मैं उस समय सोया हुआ था
मुझे लगा मेरी नींद में
आ गई है कोई बिल्ली

उसकी लम्बी छलांग से
टूट गयी मेरी नींद
बाहर गया
जब मैं उसका पीछा करता हुआ
तो देखा
मेरी पत्नी थी

मुझे देख मुस्कराती हुई
फिर वह बरसने लगी
मेघ की तरह
मेरे कमरे में

मैं पहली बार भीगा था
कोई सपना जो देखा था
वर्षों पहले
जैसे वह सच हुआ था
मैंने उसे कई बार छुआ था

पर आज जो कुछ मेरे मन में हुआ
वह कभी नहीं हुआ था


----  विमल कुमार

नज़्म : वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत

वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत थे
जो इश्‍क को काम समझते थे
या काम से आशिकी रखते थे
हम जीते जी नाकाम रहे
ना इश्‍क किया ना काम किया
काम इश्‍क में आड़े आता रहा
और इश्‍क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
शायर: फैज अहमद फैज

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

Image
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी में 9 सितम्बर, 1850 को हुआ था। इनके पिता श्री गोपालचन्द्र अग्रवाल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और‘गिरिधर दास’ उपनाम से भक्ति रचनाएँ लिखते थे। घर के काव्यमय वातावरण का प्रभाव भारतेन्दु जी पर पड़ा और पाँच वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना पहला दोहा लिखा।
उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-
लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान। बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥
उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० में उन्हें 'भारतेंदु'(भारत का चंद्रमा) की उपाधि प्रदान की।
धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया।…

प्रकाश फ़िक्री

प्रकाश फ़िक्री
(1930-2008, रांची, भारत)
(ज़हीरुल हक़)
आधुनिक उर्दू शायर
किताबें: सफ़र सितारा और एक ज़रा सी बारिश



आँधियाँ आती हैं और पेड़ गिरा करते हैंआँख पत्थर की तरह अक्स से ख़ाली होगीअजीब रुत है दरख़्तों को बे-ज़बाँ देखूँचाँदी जैसी झिलमिल मछली पानी पिघले नीलम सादुश्मनी की इस हवा को तेज़ होना चाहिएएहसास-ए-ज़ियाँ चैन से सोने नहीं देताहवा से उजड़ कर बिखर क्यूँ गए हवा से ज़र्द पत्ते गिर रहे हैंजिस का बदन गुलाब था वो यार भी नहींकहाँ कहाँ से गुज़र रहा हूँ काली रातों में फ़सील-ए-दर्द ऊँची हो गईख़ुनुक हवा का ये झोंका शरार कैसे हुआकिसी का नक़्श अंधेरे में जब उभर आयामुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना थापहाड़ों से उतरती शाम की बेचारगी देखेंरफ़्ता रफ़्ता सब मनाज़िर खो गए अच्छा हुआरंगीन ख़्वाब आस के नक़्शे जला भी देसाथ दरिया के हम भी जाएँ क्या शबनम भीगी घास पे चलना कितना अच्छा लगता हैतेरी सदा की आस में इक शख़्स रोएगावो राब्ते भी अनोखे जो दूरियाँ बरतेंज़र्द पेड़ों पे शाम है गिर्यां