हिंदी पखवाड़ा

टूटे धागों को 
फिर से जोड़ते हैं 
चलो.... 
खामोशी तोड़ते हैं!!!


वसुंधरा व्यास की इन पंक्तियों के साथ आप सभी आमंत्रित है, अपने आप को अभियक्त करने केलिए.... 
अपनी अभिव्यक्ति -- अपनी ही भाषा में.... 



भाषा का प्रयोग ही भाषा  जीवन  है. हिंदी में बोलना शान है , आगे बढे और हिंदी में बोलना शुरू कीजिये। 
कितनी ही भाषाएँ आती हों मुझे, पर जो मजा हिंदी में सुनाने सुनाने में आता है, वो कहीं और नहीं।

   भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में :-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

इसमें कवि मातृभाषा का उपयोग सभी प्रकार की शिक्षा के लिए करने पर जोर देते हैं।  निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण सम्भव नहीं है।
विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान, सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये।

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