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हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं जिगर मुरादाबादी हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये ने'आमत भी कम नहीं मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अह्ल-ए-सितम नहीं मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वुस'अतें दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयख़ाने में मगर क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं मर्ग-ए-ज़िगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़ इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं

इश्क़ की दास्तान है प्यारे

इश्क़ की दास्तान है प्यारे इश्क़ की दास्तान है प्यारे अपनी-अपनी ज़ुबान है प्यारे हम ज़माने से इंतक़ाम तो लें एक हसीं दर्मियान है प्यारे तू नहीं मैं हूं मैं नहीं तू है अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे रख क़दम फूँक-फूँक कर नादान ज़र्रे-ज़र्रे में जान है प्यारे जिगर मुरादाबादी