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Showing posts from February, 2008

अमीर खुसरो

छाप-तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिला के । प्रेम बटी का मदवा पिला के, मतबारी कर दीन्हीं रे मोंसे नैना मिला के । खुसरो निज़ाम पै बलि-बलि जइए मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिला के । `2`जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर । जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर । तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिली तुम आय कर । जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ तेरी जो चिंता दिल धरूँ, एक दिन मिलो तुम आय कर । मेरी जो मन तुम ने लिया, तुम उठा गम को दिया तुमने मुझे ऐसा किया, जैसा पतंगा आग पर । खुसरो कहै बातों ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर । अमीर खुसरो

चिट्ठाजगत Tags: ब्रज मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है
झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है.पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा
बेपर वो शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है. अपनी नज़र से ख़ुद को देखूं तो मान भी लूं
आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है.हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत
रिश्वत का दौर अब भी उनको चला रहा है.बुझता चिराग़ दिल में, किसने ये जान डाली
फिर से हवा के रुख़ पे ये झिलमिला रहा है.पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी
कुछ नाम देके आदम उलझन बढ़ा रहा है.बरसों की वो इमारत, अब हो गयी पुरानी
कुछ रंग-रौगनों से उसको सज़ा रहा है. देवी नांगरानी

हमने पाया तो बहुत कम है बहुत खोया है......

हमने पाया तो बहुत कम है बहुत खोया है
दिल हमारा लबे-दरिया पे बहुत रोया है.कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया हैअरसा लगता है जो पाने में, वो पल में खोया
बीज अफ़सोस का सहरा में बहुत बोया है.तेरी यादों के मिले साए बहुत शीतल से
उनके अहसास से तन-मन को बहुत धोया हैहोके बेदार वो देखे तो सवेरे का समाँ
जागने का है ये मौसम, वो बहुत सोया है.बेकरारी को लिये शब से सहर तक, दिल ये
आतिशे-वस्ल में तड़पा है, बहुत रोया है.इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.देवी नांगरानी

आओ मुक़ाबला करें

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर  से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख  से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु सही, आओ मुक़ाबला करें ।                                                       ---सरदार भगत सिंह____________________________________________________________Tippadiya :तर्ज़-ए-ज़फ़ा = अन्याय, दहर = दुनिया, चर्ख = आसमान, अदु = दुश्मन दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी । ट्रायल के दौरान दिया गया उनका यह मशहूर बयान:  http://www.raviwar.com/news.asp?c3

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था. जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं छोटे से एक घर में ही सारा जहान था. शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था. तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था. कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था------देवी नांगरानी

सखि, वसन्त आया

सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।                                               सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

मैया मैं नहीं माखन खायौ

~1~मैया मैं नहीं माखन खायौ ॥
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ॥
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ॥
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥
बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ॥
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥ ~2~मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी ।
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी ॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी ।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी ॥

वीणावादिनि वर दे

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।वर दे, वीणावादिनि वर दे। सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, है हरि, डाला जाऊँ चाह नहीं, देवों के शिर पर, चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ! मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।                                          माखनलाल चतुर्वेदी

बसंत पंचमी

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ऋतुराज वसंत का आगमन होचुका है ।   और आज बसंत पंचमी है --- बसंत पर्व का प्रथम दिवस । इसी दिन श्री यानी विद्या की अधिष्ठात्री, ज्ञान की देवी माँ सरस्वती प्राक्ट्योत्सव मनाया जाता है।  इसी दिन सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर जाता है। हर ओर पेड़-पौधे अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से आच्छादित दिखाई देते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध से भर उठता है । चारो और वसंत के आगमन की सूचना बटाते हुए भौरे गुंजन करते है। इसी दिवस को माँ शारदा की वंदना की जाती है ज्ञान प्राप्ति के लिए
सरस्वती वंदना~१~सरस्वती तु 'धी' देवी च प्रजापतिः । 'ऐं' बीजं कश्यपश्चषिर्यर्न्त्रं चाऽपि सरस्वती॥ कथितान्यस्य भूती तु हषार् च प्रभवा पुनः । कलात्मता स उल्लासो द्वयं प्रतिफलं मतम्॥~२~या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्तावृता
या वीणावरदंडमंडितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभितिभिर्देवैःसदावंदिता
सामांपातु सरस्वतीभगवती निःशेषजाड्यापहा  ।।शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद…

इतने ऊँचे उठो

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥                                                                                    --- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

कुछ छंद ओरकुट से

तो पेश-ए-खिदमत है , कुछ चुने हुए पद्य , ओरकुट से



रहो जमीं पे मगर आसमां का ख्वाब रखो
तुम अपनी सोच को हर वक्त लाजवाब रखो
खड़े न हो सको इतना न सर झुकाओ कभी
उभर रहा जो सूरज तो धूप निकलेगी
उजालों में रहो, मत धुंध का हिसाब रखो
मिले तो ऐसे कि कोई न भूल पाये तुम्हें
महक वंफा की रखो और बेहिसाब रखो
अक्लमंदों में रहो तो अक्लमंदों की तरह
और नादानों में रहना हो रहो नादान से
वो जो कल था और अपना भी नहीं था, दोस्तों
आज को लेकिन सजा लो एक नयी पहचान से




खामोशी का मतलब इन्कार नही होता..
नाकामयाबी का मतलब हार नही होता..
क्या हुआ अगर हम उन्हे पा ना सके..
सिर्फ पा लेने का मतलब प्यार नही होता...

चाहने से कोई बात नही होती....
थोडे से अंधेरे से रात नही होती..
जिन्हे चाहते है जान से ज्यादा..
उन्ही से आज कल मुलाकात भी नही होती...



कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं
मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं

कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में
सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं

कई सदियों में आती है कोई सूरत हसीं इतनी
हुस्न पर हर रोज कहां ऐसे श़बाब आते हैं

रौशनी के वास्ते तो उनका नूर ही काफी है
उनके दीदार को आफ़ताब और म…

चींटी को देखा?

चींटीकोदेखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत। गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती। चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय। वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।---सुमित्रानंदन पंत चिट्ठाजगत Tags: सुमित्रानंदन पंत सम्बन्धित चिट्ठे">सुमित्रानंदन पंत

पिछली रात को ....

इंतजार जैसे उसका इमान हो
कुछ एसे ही वो इंतजार करता रहा
उस लहर का, जो छोड़ गयी थी
कल रात कुछ सीपिया तो कुछ मोती जैसे कदमो के निशां

लहरों का क्या है ,
आती है ... चली जाती है
पर उस किनारे का क्या
जो देता है उतना ही प्यार उतना ही दुलार
हर आने वाली उस लहर को
जिसे आख़िर मे चले जाना है

पल भर का साथ था,
फिर मिलन इंतजार
हर लौटती उस लहर को,
जो छोड़ आई थी अपने कदम-ए-निशां
उस किनारे पर, पिछली रात को ….

KS

K. Singh © 2008. All rights are reserved. No part of this Article, including text and photographs, may be copied, reproduced or transmitted without the express permission of the author.
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गिरगिट ...................................

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गिरगिट

आपसभी तो जानते ही होंगे इस अजब गजब प्राणी को ............................. गिरगिट है नाम इसका, हिन्दुस्तानी गिरगिट को जीवशास्त्री Chamaeleo chamaeleonके नाम से पुकारते है तो आंग्लभाषी Chameleon के नाम से

अब एक गिरगिट इस इंटरनैट पर भी है , बस ये नरंग बदल के लिपि बदलता है। अब आप कोई भी वेबपेज [यूनिकोड मे संपादित ] को किसी भी भारतीय भाषा की लिपि मे देख सकते है

वेब साइट गिरगिट





अब अगर वेबपेज ही न हो , आपके पास कोई दस्तावेज या ईमेल मे हो तो यहाँ पर चिपका के अपनी लिपि मे समझाने की कोशिश कर ले .....

गिरगिट



लीजिये अब जरा एक मुशायरा देख लीजिये, गोरखपुर के गिरगिट गोरखपुरी का ...............




अरे , और जानना चाहते है तो इस वेबसाइट को भी कृतार्थ कर दीजिए
हिंट्रांस : हिंदी के लिए रोमन-नागरी लिप्यंतरण योजना और रूपांतरण उपकरण

अबआख़िरमे , एक साँप ने भी गिरगिट की तरह रंग बदला सीख लिया है, आप जानना चाहेगे - तो लीजिये अपने चूहे को थोडा सा यहाँ पे दोड़ा के दबायिये ..........
अब एक साँप और गिरगिट का युद्ध भी देख ले





अब हमे तो इतने ही गिरगिट मिले , अगर आप को कुछ और पता हो तो हमे कमेंट्स के माध्यम से जरु…

कुछ हिन्दी की पुस्तक

आयिए कुछ हिन्दी की पुस्तके पढे :

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