Posts

Showing posts with the label बूँद

बूँद

बूँद


ज्योंनिकलकरबादलोंकीगोदसे
थीअभीएकबूँदकुछआगेबढ़ी
सोचनेफिर-फिरयहीजीमेंलगी,
आह ! क्योंघरछोड़करमैंयोंकढ़ी ?

देवमेरेभाग्यमेंक्याहैबदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोगयोंहीहैंझिझकते, सोचते
जबकिउनकोछोड़नापड़ताहैघर
किन्तुघरकाछोड़नाअक्सरउन्हें
बूँदलौंकुछऔरहीदेताहैकर ।

----------------