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कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है

कलियों के होंट छूकर वो मुस्करा रहा है झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है. पागल है सोच मेरी, पागल है मन भी मेरा बेपर वो शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है. अपनी नज़र से ख़ुद को देखूं तो मान भी लूं आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है. हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत रिश्वत का दौर अब भी उनको चला रहा है. बुझता चिराग़ दिल में, किसने ये जान डाली फिर से हवा के रुख़ पे ये झिलमिला रहा है. पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी कुछ नाम देके आदम उलझन बढ़ा रहा है. बरसों की वो इमारत, अब हो गयी पुरानी कुछ रंग-रौगनों से उसको सज़ा रहा है. देवी नांगरानी

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था. जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं छोटे से एक घर में ही सारा जहान था. शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था. तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था. कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था ------देवी नांगरानी