तेरी रज़ा

“तेरी रज़ा” तेरे नाम से ही तो मेरी हर साँस जगी, तेरे इश्क़ में डूबकर ही मेरी रूह सजी। मैं ढूँढता रहा तुझको हर इक दर–ओ–निशाँ में, जब दिल के भीतर देखा, तू वहीं तो बसी। तेरे नूर से रौशन हर अँधेरा बन गया, तेरी एक नज़र से ही मेरी रात हँसी। ना मांगूँ जहाँ, ना शोहरत, ना जन्नत की चाह, बस तेरे क़दमों में हो मेरी ये ज़िन्दगी। मैं कुछ भी नहीं, तू ही सब कुछ है यहाँ, तेरी रज़ा में ही तो मेरी बंदगी। अब न कह “मैं”, न कह “तू” जुदा, इश्क़ में मिटकर ही मिली है ये आज़ादी।

खुशबू का पथ – एक भाव-यात्रा

जीवन, अपनी समग्रता में, एक निरंतर प्रवाह है—जहाँ हर अनुभव की गंध समय के साथ मिटती नहीं, बल्कि भावों के रूप में सजीव रहती है। “खुशबू का पथ” इसी संवेदना की यात्रा है—जहाँ मिट्टी की सौंधी आहट में मानवीय हृदय का स्पंदन मिलता है। यह कविता प्रकृति, प्रेम, विरह, स्मृति और पुनर्जागरण की उस मधुर लय को खोजती है, जहाँ हर क्षण कुछ समाप्त होकर फिर से जन्म लेता है। यह खुशबू केवल फूलों की नहीं, बल्कि आत्मा की है—जो स्थिर नहीं, बस चलती रहती है... समय के पार, मन की गहराई तक। चलती हवा में महके सपनों की कोई डोरी, फूलों के मन की बाँहे ख़ुशबू ने थोड़ी जोरी। छू ले जो रूह को बनकर अरमानों की धुन, ऐसी ही ख़ुशबू में बसती है कोई कहानी पूरी। खुशबू तो बस देह नहीं—मन का अनुभव है, रह जाती जो छूने के बाद भी अछूती लहर है। मिट्टी से उठकर आकाश में घुलती जाती, शायद यही बताती—क्षणभंगुरता ही सत्य कहर है। ओस की बूँद पे जब सूरज मुस्कुराता है, मिट्टी की खुशबू मन को गीत सुनाता है। पवन के संग बहती यह सृष्टि की सरगम, हर श्वास बताती—जीवन बस लौट आता है। बिन देखे जिसे मन हर क्षण पहचानता है, वही तो खुशबू है जो भीतर विराजता है। दीपक ...

ख़ुद से ख़ुद तक

ख़ुद से ख़ुद तक हर इक सफ़र में खो गया, तब राह मिल गई, जब “मैं” मिटा तो मुझको मेरी चाह मिल गई। जिसे समझा था मैं, वही पर्दा बन गया, हटा जो पर्दा, मुझको उसकी निगाह मिल गई। तलाश में जो उम्र गुज़री, वो ही सबक बनी, ख़ामोशी में भी दिल को इक दुआह मिल गई। न कर्ता मैं, न भोक्ता, यह बोध जब हुआ, माया की हर गिरह मुझसे रिहाह मिल गई। अब न पूछ मैं कौन हूँ, कहाँ से हूँ कहाँ, तेरी रज़ा से हर डगर, हर राह मिल गई।

Hindi | इश्क़ फुसफुसाया— “मिट जा, तो ही पाएगा।”

मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता— यह देह–बुद्धि का जाल रहा। सत्य कहीं बाहर खोजता, और भीतर अज्ञान का हाल रहा। जब विवेक ने माया काटी, अहंकार का आवरण गिर गया— ब्रह्म की शांति में मौन हुआ मन, तभी अंतःस्वर ने यह समझाया— इश्क़ फुसफुसाया— “मिट जा, तो ही पाएगा।”

नया दिन, नई दौड़

रात की चादर हटे,   आभा स्वर्णिम फूटे।   क्षितिज पर अग्नि जगे,   जीवन फिर से छूटे।   पक्षी गाएँ मधुर गान,   पवन करे आलिंगन।   सूर्य किरणें दें संदेश—   हर प्रभात है पुनर्जन्म।   प्रभात का आगमन मानो जीवन की किताब का नया अध्याय हो। रात की काली चादर जब हटती है, तो लगता है जैसे अंधकार ने बोरिया-बिस्तर बाँध लिया हो और उजाले ने घर-आँगन में डेरा डाल दिया हो। सूर्योदय की पहली किरण, सोने पर सुहागा की तरह, थके हुए मन में नई ऊर्जा भर देती है। सूर्य का उदय केवल प्रकाश नहीं, बल्कि आत्मा का पुनर्जन्म है। यह उस दीपक की लौ है जो बुझते-बुझते फिर से जल उठती है। पक्षियों का कलरव कानों में रस घोलता है, जैसे वीणा की झंकार। पवन का स्पर्श मन को ठंडी छाया देता है—मानो जीवन की प्यास बुझाने वाला अमृत। “नया दिन, नई दौड़” और सच ही है—हर प्रभात हमें फिर से कर्मभूमि पर उतरने का अवसर देता है। यह वह क्षण है जब “सोई किस्मत जाग उठती है” , जब “मन के अंधेरे में दीया जलता है” । देखें तो सूर्योदय है—जैसे नवजात शिशु की मुस्कान, वैसे ही क्षितिज पर...

दहलीज़

 दहलीज़, एक घर की मिट्टी पर उभरी पतली-सी रेखा नहीं भर, यहीं से आँगन और संसार, अपनापन और अजनबीयत पहली बार एक-दूसरे को पहचानते हैं। कभी यह वर्जना है— “यहाँ तक आना, आगे मत बढ़ना”, तो कभी यह आमंत्रण— “बस एक क़दम और, फिर नया जीवन शुरू।” कभी मन की दहलीज़ पर ठिठक जाती हैं बातें, होंठों तक आकर भी शब्द नहीं बनतीं, जैसे सत्य दरवाज़े की चौखट पर खड़ा हमारे साहस का इंतज़ार करता रहे। और कभी ज्ञान की दहलीज़ होती है— एक ऐसा पल, जिसके बाद पुरानी समझ लौट कर नहीं आती, जहाँ से आगे जो दिखता है, वह वही दुनिया होती है, पर देखने वाली नज़र हमेशा के लिए बदल चुकी होती है।

स्वप्न और जागरण II

स्वप्न और जागरण के बीच जो पल ठहर जाता है, वहीं असली मैं का पहला परिचय मिलता है; आँखें खुली हों या मूँदी, बात बस इतनी-सी है— जो भीतर जाग रहा हो, जीवन असल में वही होता है।

स्वप्न और जागरण

तेरी पलकों में ठहरी नींद ने बस इतना-सा भेद बताया है— समय न बाहर रुकता है, न घड़ी की सुइयों में, वह तो वहीं ठहर जाता है एक क्षण को, जहाँ मन यह पहचान ले कि जो घट रहा है, वही स्वप्न, और जो देख रहा है, वही सच्चा जागना है।

उपमा से भी परे तू

तेरी पलकों पर ठहरी हुई नींद भी कुछ कहती होगी, ज्यों मानसरोवर पर झुकी चाँदनी चुपचाप लहरों से बात करे। समय – ये चोरन का सरदार – चुरा लेता मुस्कान तेरे अरुण अधरों से, फिर भी तेरे नयन दीपक-से हर अँधियारे को दीवाली बना दें। अम्बर आज मानो तेरे आँगन का झूला-सा झूल रहा हो, तारे तेरे नूपुर बन धीमे-धीमे रुनझुन गुनगुनाते हैं। हे प्रिये, तू ऐसी उपमा है, जिसकी तुलना में उपमान भी लज्जाते, जैसे भारत के सम भारत, वैसे ही तेरे सम तुझी को पाते।

प्रभात

रात्रि की चादर ढलती है धीरे-धीरे,   अंधकार का साम्राज्य टूटता है निरंतर।   क्षितिज पर सुनहरी अग्नि की रेखा,   जैसे ईश्वर ने लिखी हो नई गाथा।   ओ सूर्य! तेरे रथ के पहिए जब घूमते हैं,   धरती के हृदय में जीवन की ध्वनि गूंजती है।   तेरी किरणें—स्वर्णिम तीरों सी,   नव आशा के कक्ष में प्रवेश करती हैं।   निद्रा से जागते वृक्ष, पवन में झूमते,   पक्षियों के स्वर गूँजते जैसे वीणा की तान।   हर कण में नया उत्सव, हर श्वास में नया गीत,   सूर्योदय—मानवता का शाश्वत पुनर्जन्म।   हे प्रभात! तू केवल प्रकाश नहीं,   तू आत्मा का पुनरुत्थान है।   तेरे संग हर दिन एक नाटक आरंभ होता है,   जहाँ जीवन स्वयं रंगमंच पर उतरता है।