आने वाली सुबह

  आने वाली सुबह   शायद सिर्फ़ नई रोशनी नहीं होगी,   शायद किसी पुरानी थकान का   धीरे‑धीरे उतरता हुआ बोझ होगी।   रात भर जागती जो चिंताएँ थीं,   उनकी पलकों पर जब ओस जमेगी,   तो पहली किरण   धीरे से उनका माथा चूम कर पूछेगी—   अब चलें?   खिड़की की सलाख़ों से   रेंगती हुई जो हल्की‑सी धूप आएगी,   वो याद दिलाएगी कि   बीता हुआ दिन फैसला नहीं,   बस एक ड्राफ़्ट था   जिसे आज फिर से सुधारा जा सकता है।   आने वाली हर सुबह   किनारे पर लौटती उस लहर जैसी है,   जो हर बार नई कहानियाँ लेकर आती है,   भले ही   कल की रेत पर लिखी इबारतें   समंदर ने मिटा दी हों।   तो जब भी अगली सुबह   तुम्हारे दरवाज़े पर हल्के‑हल्के दस्तक दे,   ज़रा मुस्कुरा कर कहना—   ठहर, मैं भी   थोड़ा‑सा नया हो कर आता हूँ। -KS

असल “प्रभात”

सुबह जब मुस्कुरा उठी तो लगा जैसे समय ने एक और मौका चुपके से हथेलियों पर रख दिया हो— बिना शोर, बिना ऐलान के। रात भर जो सवाल छत की दरारों में टंगे रहे, सुबह की पहली किरण ने उन्हें हल नहीं किया, बस इतना किया कि अँधेरे को थोड़ा कम कर दिया, ताकि हम अपने ही चेहरे को थोड़ा साफ़ देख सकें। हर नई सुबह किसी जवाब की नहीं, एक नए प्रश्न की जन्मस्थली है— मैं कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ, और जो भागदौड़ में खो गया कल, वो सच में ज़रूरी था भी या नहीं। सुबह जब मुस्कुरा उठी तो समझ आया कि दिन बदलने से ज़्यादा ज़रूरी नज़र का बदलना होता है। सूरज तो हर रोज़ लगभग एक ही समय पर उगता है, पर अर्थ तभी बदलता है जब हम अपने भीतर की खिड़की थोड़ी और खोल देते हैं। शायद ज़िंदगी भी इन सुबहों की तरह ही है— न पूरी रोशनी, न पूरा अँधेरा, बस दो के बीच का एक पुल, जहाँ चलते‑चलते हम सीखते हैं कि मंज़िल से ज़्यादा सवाल पूछने की हिम्मत ही असल “प्रभात” है। -KS

पिछली रात ....

पिछली रात की तरह आज भी रेत ठंडी है, हवा नम है, आकाश पर चाँद आधा है, पर उसका दिल पूरा भरा हुआ है उन अधूरे क़दमों की आहट से। वो जानता है, लहरों को जाना ही होगा, पर फिर भी दिल के किसी कोने में एक छोटा सा किनारा रोज़ बन जाता है, जहाँ वो चुपचाप खड़ा बस इतना सा ख्वाब देखता है— कभी तो कोई लहर लौटकर न जाए…।