सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Official Gmail Blog: Millions of Buzz users, and improvements based on your feedback

Official Gmail Blog: Millions of Buzz users, and improvements based on your feedback

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिन्दी की किताबे | Read hindi stories online

Image via Wikipedia हिन्दी की किताबे पुरानी पोस्ट : क्लिक करें हिन्दी की किताबे माँ - कहानी (प्रेमचंद) ईदगाह - कहानी (प्रेमचंद) अलग्योझा - कहानी (प्रेमचंद) इस्तीफा - कहानी (प्रेमचंद) कप्तान साहब -कहानी (प्रेमचंद) प्रायश्चित - कहानी (प्रेमचंद) बैंक का दिवाला - कहानी (प्रेमचंद) शान्ति - कहानी (प्रेमचंद) समर-यात्रा - कहानी (प्रेमचंद) मैकू - कहानी (प्रेमचंद) झाँकी - कहानी (प्रेमचंद) पूस की रात -कहानी (प्रेमचंद) ठाकुर का कुआँ -कहानी (प्रेमचंद) स्वामिनी - कहानी (प्रेमचंद) नाग-पूजा -कहानी (प्रेमचंद) शंखनाद - कहानी (प्रेमचंद) दुर्गा का मन्दिर - कहानी (प्रेमचंद) आत्माराम - कहानी (प्रेमचंद) पंच परमेश्वर - कहानी (प्रेमचंद) बड़े घर की बेटी - कहानी (प्रेमचंद) चतुर नाई (बाल-कहानी) रत्ना भाई (बाल-कहानी) कंजूस सेठ (कहानी) मुर्ख बहु (बाल-कहानी) आनंदी कौआ (बाल-कहानी) मुर्ख कौआ (बाल-कहानी) तिवारी जी (कहानी) नकलची नाई (कहानी) करामाती तुम्बी (बाल-कहानी) बोहरा और बोहरी (बाल-कहानी) चतुर खरगोश - बाल-कहानी कुनबी और कुनबिन- कहानी चोर और राजा (कहानी) कौआ और मैना (बाल-कहानी) गिलहरीबाई (बाल-कहा

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र

स्व. पंडित प्रताप नारायण मिश्र प्रतापनारायण मिश्र (सितंबर, 1856 - जुलाई, 1894) भारतेंन्दु मंडल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। पंडित जी का जन्म उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव निवासी, कात्यायन गोत्रीय, कान्यकुब्ज ब्राहृमण पं. संकटादीन के घर आश्विनी कृष्ण नौमी को संवत 1913 वि. में हुआ था।वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रतिभारतेंदु" अथवा "द्वितीयचंद्र" कहे जाने लगे थे। बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे और अक्षरारंभ के पश्चात् उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे। किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अँगरेजी मदरसे में भरती करा दिया। तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष

पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

डॉ॰ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (27 मई 1894-28 दिसम्बर 1971) जिन्हें ‘मास्टरजी’ के नाम से भी जाना जाता है, हिंदी के निबंधकार थे। वे राजनंदगांव की हिंदी त्रिवेणी की तीन धाराओं में से एक हैं। राजनांदगांव के त्रिवेणी परिसर में इनके सम्मान में मूर्तियों की स्थापना की गई है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म राजनांदगांव के एक छोटे से कस्‍बे खैरागढ़ में 27 मई 1894 में हुआ। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी खैरागढ़ के प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा म.प्र. के प्रथम मुख्‍यमंत्री पं॰ रविशंकर शुक्‍ल जैसे मनीषी गुरूओं के सानिध्‍य में विक्‍टोरिया हाई स्‍कूल, खैरागढ में हुई थी। प्रारंभ से ही प्रखर पदुमलाल पन्‍नालाल बख्‍शी की प्रतिभा को खैरागढ के ही इतिहासकार लाल प्रद्युम्‍न सिंह जी ने समझा एवं बख्‍शी जी को साहित्‍य सृजन के लिए प्रोत्‍साहित किया और यहीं से साहित्‍य की अविरल धारा बह निकली। प्रतिभावान बख्‍शी जी ने बनारस हिन्‍दू कॉलेज से बी.ए. किया और एल.एल.बी. करने लगे किन्‍तु वे साहित्‍य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं समयाभाव के कारण एल.एल.बी. पूरा नहीं कर पाए। यह 1903 का समय था जब वे घर के साहित्