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मई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
खिसक गयी है धूप पैताने से धीरे-धीरे खिसक गयी है धूप। सिरहाने रखे हैं पीले गुलाब। क्या नहीं तुम्हें भी दिखा इनका जोड़- दर्द तुम में भी उभरा? सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" विश्वेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,लंबोदराय सकलाय जगध्दिताय। नागाननाय श्रुतियग्यविभुसिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

मराठी पुस्तकें (in Pdf Format)

मराठी पुस्तकें   (in Pdf Format)   नोबेल  विजेत्यांच्या  सहवासात   :   By Mrs. Suhasini Chorghade. वसुन्धरेचे  अविष्कार  :  By Prof. S. L. Chorghade.    महा - महात्मा ज्योतिबा  फुले  :   By Adv. Ram Kandge    Pune City its History Growth and Development(758 to 1998 A.D.) :  By Dr.S.G.Mahajan पुणे  शहराचा  द्न्यनाकोश  Vol - I :  By Dr.S.G.Mahajan    द्न्यनेश्वरी  शब्द  ओवी  सूचि :  By Shri P.V.Kulkarni and Shri A.V.Atre    स्वयंसेवी  संस्था :   By Dr. Dhananjay Lokhande    राष्ट्रीय  एकात्मता :   By Prof. Tej Nivalikar     ज्येष्ठ  नागरिक : वास्तव  अणि  समस्या :   By Dr. Navnath Tupe     महिला  सबलीकरण :    By Dr. Vilas Adhav     असंघटित  कामगार :    By Dr. Satish Shirsath  द्न्यनेश्वरी  : En...

अकबर इलाहाबादी

आपका मूल नाम सैयद हुसैन था। उनका जन्म 16 नवंबर, 1846 में इलाहाबाद में हुआ था। अकबर इलाहाबादी विद्रोही स्वभाव के थे। वे रूढ़िवादिता एवं धार्मिक ढोंग के सख्त खिलाफ थे और अपने शेरों में ऐसी प्रवृत्तियों पर तीखा व्यंग्य (तंज) करते थे। उन्होंने 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम देखा था और फिर गांधीजी के नेतृत्व में छिड़े स्वाधीनता आंदोलन के भी गवाह रहे। उनका असली नाम सैयद हुसैन था। अकबर कॆ उस्ताद् का नाम वहीद था जॊ आतिश कॆ शागिऱ्द् थॆ वह अदालत में एक छोटे मुलाजिम थे, लेकिन बाद में कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया और सेशन जज के रूप में रिटायर हुए। इलाहाबाद में ही 9 सितंबर, 1921 को उनकी मृत्यु हो गई।

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं देस ही की याद है बस गत मुझे दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे अकबर इलाहाबादी रोज़े-रिन्दी = शराब पीने का दिन नसीबे-दीगराँ = दूसरों की क़िस्मत में क़ूवत = ताक़त

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं जिगर मुरादाबादी हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये ने'आमत भी कम नहीं मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अह्ल-ए-सितम नहीं मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वुस'अतें दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयख़ाने में मगर क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं मर्ग-ए-ज़िगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़ इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं