उपमा से भी परे तू

उपमा से भी परे तू

तेरी पलकों पर ठहरी हुई नींद भी कुछ कहती होगी, ज्यों मानसरोवर पर झुकी चाँदनी चुपचाप लहरों से बात करे। समय – ये चोरन का सरदार – चुरा लेता मुस्कान तेरे अरुण अधरों से, फिर भी तेरे नयन दीपक-से हर अँधियारे को दीवाली बना दें। अम्बर आज मानो तेरे आँगन का झूला-सा झूल रहा हो, तारे तेरे नूपुर बन धीमे-धीमे रुनझुन गुनगुनाते हैं। हे प्रिये, तू ऐसी उपमा है, जिसकी तुलना में उपमान भी लज्जाते, जैसे भारत के सम भारत, वैसे ही तेरे सम तुझी को पाते।

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