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स्वप्न और जागरण
स्वप्न और जागरण
तेरी पलकों में ठहरी नींद ने बस इतना-सा भेद बताया है— समय न बाहर रुकता है, न घड़ी की सुइयों में, वह तो वहीं ठहर जाता है एक क्षण को, जहाँ मन यह पहचान ले कि जो घट रहा है, वही स्वप्न, और जो देख रहा है, वही सच्चा जागना है।
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