दहलीज़

दहलीज़

 दहलीज़, एक घर की मिट्टी पर उभरी पतली-सी रेखा नहीं भर,

यहीं से आँगन और संसार,

अपनापन और अजनबीयत

पहली बार एक-दूसरे को पहचानते हैं।



कभी यह वर्जना है—

“यहाँ तक आना, आगे मत बढ़ना”,

तो कभी यह आमंत्रण—

“बस एक क़दम और, फिर नया जीवन शुरू।”



कभी मन की दहलीज़ पर ठिठक जाती हैं बातें,

होंठों तक आकर भी शब्द नहीं बनतीं,

जैसे सत्य दरवाज़े की चौखट पर खड़ा

हमारे साहस का इंतज़ार करता रहे।



और कभी ज्ञान की दहलीज़ होती है—

एक ऐसा पल, जिसके बाद

पुरानी समझ लौट कर नहीं आती,

जहाँ से आगे जो दिखता है,

वह वही दुनिया होती है,

पर देखने वाली नज़र

हमेशा के लिए बदल चुकी होती है।

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