ख़ुद से ख़ुद तक
ख़ुद से ख़ुद तक
हर इक सफ़र में खो गया, तब राह मिल गई,
जब “मैं” मिटा तो मुझको मेरी चाह मिल गई।
जिसे समझा था मैं, वही पर्दा बन गया,
हटा जो पर्दा, मुझको उसकी निगाह मिल गई।
तलाश में जो उम्र गुज़री, वो ही सबक बनी,
ख़ामोशी में भी दिल को इक दुआह मिल गई।
न कर्ता मैं, न भोक्ता, यह बोध जब हुआ,
माया की हर गिरह मुझसे रिहाह मिल गई।
अब न पूछ मैं कौन हूँ, कहाँ से हूँ कहाँ,
तेरी रज़ा से हर डगर, हर राह मिल गई।
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